सोमवार, 21 जुलाई 2008

आत्म हत्या क्यों जनाब?

भोजपूरी कहानी कल पढियेगा, आज कुछ और, इसमे मेरी गलती नही है, अनुप जी की गलती है, तो कोई शिकायत करनी हो तो उनसे किया जाये और लेख अच्छा लगे तो उसका क्रेडिट मुझे दें :P, पहले बता रही हूँ कि यह लेख कल रात यानि की रविवार को लिखा था, अनुप जी ने कहा कि इसे पोस्ट करना ही चाहिये, इसलिये मै कर रही हूँ ।
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कुछ दिनो पहले अनुप जी का लेख पढा जीवन अपने आपमे अनमोल है लेख का अभिप्राय है "आत्महत्या क्यों ?"
मैने पढा और उसी वक्त उनसे बात हूई कि इस पर अभी कुछ और सोचने की जरूरत है, इसके बाद बात आयी गयी रह गयी, मतलब कि मेरी व्यस्तता मे निकल गयी, आज रविवार है, मानसिक रूप से आज मेरी छुट्टी का दिन है, और आज तबीयत भी कुछ ऐसी है कि बस दिमाग चल रहा है, इसलिये मै बैठी हूँ और दिमाग चल रहा है, आज बैठे-बैठे कई अनछुए पहलुओ पर रोशनी डालने का मन हूआ, कुछ दोस्तो को चिढाया, किसी को वर्चुअल खाना खिलाया, और वादा असली वाला चॉकलेट खिलाने का लिया गया, कुछ दोस्तो से फोन पर भी गपशप हुई, प्रोसेस यही था.. :)
तभी एक सहेली बातो-बातो मे ही रो पडी, कहने लगी कि गरिमा, जी करता है मर जाऊँ।
मर जा,
वो चुप हो गयी, शायद ऐसे जवाब की उपेक्षा नही थी उसको।


एक न एक दिन मरना ही है, आज ही क्यों नही, तू क्या सोचती है? किसी को तेरे जाने से परेशानी होगी? मेरी जान, यहाँ तेरे पिछे लोग कुछ दिन तक आँसु बहायेंगे और फिर अपना रास्ता नापेंगे, और ज्यादा केस हो गया तो, लोग कहेंगे जरूर लडकी ने कोई पाप किया था, किसी को मुँह दिखाने के काबिल नही रही तो बेचारी ने मौत को गले लगा लिया, जिन लोगो के कारण तू जी नही पा रही है, ढंग से ये लोग मरने भी नही देंगे। तेरी बहन रास्ते मे निकलेगी तो लडके परेशान करेंगे, १०० सवाल होंगे, जिस बहन पर तू जीते जी आँच नही आने देती, मरने के बाद क्या करेगी? तेरी आत्मा ऊपर से देख-देखकर रोयेगी, फ़िर मर कर कहाँ जायेगी?.. पर तू परेशान मत हो, तू जा और मर जा।

अब उसकी बारी थी, उसने कुछ बोला नही... काफी देर तक हमारे बीच मौन ही बोला, शब्द नही बोले, बोलते भी कैसे, शब्दो की एक सीमा होती है, पर मौन की सीमा नही होती, वो हर अकथनीय को कथनीय बना देता है, बस उसको समझने के लिये आपका दिल से मौन होना जरूरी है, जहाँ विचार भी खत्म हो जाये वहाँ से मौन की भाषा शुरू होती है, तो खैर मौन हम दोनो के बीच मे बोला, फ़िर चुप्पी तोडी गयी, हम दोनो ही सामान्य हो चुके थे, अब बारी थी शब्दो कि,

गरिमा तू ठीक कहती है, मौत इलाज नही है, परेशानियों के लिये, क्या करूँ, मै कुछ और चाहती हूँ मेरे सपने कुछ और हैं, अपने चाहते कुछ और हैं।

जो दिल कहे, दिल की आवाज गलत नही होती।

वो कैसे?

देख यार, जिन्दगी के कई पहलु होते हैं, हम दोनो ने ज्यादा नही सिर्फ़ कुछ महीने एक साथ बितायें हैं, उसके पहले हम एक दुसरे अंजानसे थे, अब मिलने के बाद बिछडने के बाद, हमारा रिश्ते मे कुछ और बात है, हम दोनो का जीवन हमारा ही क्यों, सभी का जीवन कई रंग ढंग से मिलकर बना है, मै सोचती हूँ, आज के ६ साल पहले मै क्या थी, और आज क्या हूँ तो बहूत फ़र्क महसुस होता है, आने वाले ६ साल बाद क्या होगा, उसकी कल्पना मात्र की है, एक खाँका खींच रखा है, जो जो करना है, मान ले कि वो पूरा नही होता तो क्या करूँगी?

गरिमा मै तुम्हे जानती हूँ, तुम मेरी तरह नही सोचोगी।

हाहाहा, फिर तुम नही जानती, मौत के बारे मे नजरिया ही अलग है, मै कभी आत्महत्या नही करूँगी पर लोगो को, करने पर मजबूर कर दूँगी।

व्हाट?

सॉरी, आत्महत्या नही, उन बंधनो की हत्या जिसके कारण मूझे मेरे ख्वाब नही मिल रहे हैं, मेरा अपना ही नजरिया है, मैने प्लान किया है किन रिश्तो को बनाना है, किन से दूर रहना है, किसको बचाना है, किस पर कितना वक्त देना है, किसको कब स्टाप करना है। अब हमारे सफलता के बीच कोई अच्छी कडी है तो ये रिश्ते हैं, और असफलता यानि की हमारा पैर खींचने वाले भी यही हैं, ऐसे मे उनको स्टॉप कर दूँगी। सब कुछ प्लान्ड है, हाँ इस बीच स्वभाविक मौत आ जाये तो उस पर बस नही है, और ना ही मुझे उस मौत से डर लगता है, बेफ़िक्र हूँ मै।

फिर वो बोली गरिमा मेरे जैसे लोग कमजोर होते हैं ना जो आत्महत्या करने का फ़ैसला कर लेते हैं?

तभी उसकी मम्मी ने उसे बुलाया, और उसे जाना पडा, मैने उसे वादा किया जवाब आज ही भेजुँगी, तभी अनुप जी की पोस्ट याद आ गयी, अब अपन ठहरे बिजनेस करने वाले एक साथ दोनो काम करेंगे, सो वही किया जा रहा, समय की बचत हो जायेगी, कुछ और खुराफ़ात करने के लिये।
अनुप जी के पोस्ट से
"अंकुर बता रहे थे एक दिन कि आई.आई.टी. कानपुर में कुछ दिन पहले आत्महत्या की थी वह खुद बड़ा हौसलेबाज था। कई दोस्तों को अवसाद में जब देखा तब उनके साथ रहा। उनको जीने का हौसला बंधाया। अवसाद के क्षणों से उबारा। बाद में किसी के प्रेम में असफ़ल होने के कारण योजना बना के अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली।"

मैने देखा है ऐसे ही लोग आत्महत्या करते हैं, जो कि सबका हौसला-अफ़जाई करने मे अग्रणी है, तनिक सी देर मे बस वो मौत को गले लगा लेते हैं, कारण आगे बताऊँगी।

अनुप जी आगे कहते हैं कि "बड़ा जटिल मनोविज्ञान है इस लफ़ड़े का। लेकिन मुझे जो लगता है वह यह कि लोग दिन पर दिन अकेले होते जा रहे हैं। विकट तनाव से जूझने वाले के निकट कोई नहीं होता।"
ऐसा नही कि अकेले रहने वाले लोग आत्महत्या नही करते पर, ये आँकडा गलत है अक्सर आत्महत्या वो करते हैं जो सबके साथ रहते हैं, वो मेधावी होते हैं, जो हमेशा खुद को सुलझा हुआ समझते हैं, जिन्हे लगता है कि उनके अपनो की संख्या बहुत ज्यादा है।


अनुप जी आगे कहते हैं कि "आत्महत्या करने वाले ज्यादातर वे लोग होते हैं जो अपने व्यक्तिगत जीवन के लक्ष्य पाने में असफ़ल रहते हैं। इम्तहान में फ़ेल हुये, प्रेम विफ़ल हो गया, नौकरी न मिली। अवसाद को पचा न पाये। जीवन को समाप्त कर लिया। "
ये बात सही है, पर इसमे भी उन लोगो की प्रतिशतता ज्यादा है जो अचानक से विफल हुए।

अब मै अपनी बात को समझा रही हुँ कि मेरे ऐसे कहने का कारण क्या है?

अक्सर वो लोग जो समझते हैं कि वो खुद बहुत सुलझे हूए है, उन्हे कभी यकिन ही नही होता कि वो कभी असफ़ल होंगे, वो हमेशा कहते हूए मिल जाते हैं, मेरा असफ़लता से दूर दूर का नाता नही है, जब ऐसे लोग अचानक टुटते हैं तो उनका वजूद उनसे छिन जाता है, मेरी मित्र भी इसी श्रेणी मे आती है, वो हमेशा कहती रहती थी, मैने कभी असफ़लता का मुँह नही देखा, इस बात का बहुत यकिन था उसको कभी वो असफ़ल नही हो सकती, हर श्रेणी मे वो आगे रही, पढाई लिखाई, दोस्ती, इत्यादि।
अब उसे अचानक से जो भी असफ़लता का सामना करना पडा हो, उसे तोड देने के लिये काफ़ी है, क्योंकि ऐसे वयक्तित्व कडक हो जाते है, एक सहज सा दंभ आ जाता है और जब वो टुटता है तो दुसरा रास्ता नही दिखता, वो समझ नही पाते कि जिन्दगी मे पास या फ़ेल लगा रहता है, जो इस बात को समझ नही पाते वो पलायन कर ही जाते हैं।

दुसरे श्रेणी के लोग जो पलायन करते हैं वो हैं जो दुसरो के लिये जीते है, अपने लिये कुछ नही माँगते, और एक दिन जब उनको खुद की जरूरत होती है,तो "वो" जिनके लिये "वो" जीता आया है, वो पिछे हट जाते हैं, फ़िर उसको लगता है कि मेरा जीवन व्यर्थ हो गया, ऐसे लोग भी आत्महत्या के शिकार बनते हैं।

तीसरी श्रेणी आत्महत्या करती है, वो है किसी ऐसे से यकिन टूटना जिसके लिये वो जीता मरता आया है, यह यकिन अपने प्रेमिका, माँ-बाप किसी पर भी हो सकता है, उस शक्स को लगता है कि दुनिया चाहे कुछ भी कह ले यह शक्स मुझपर यकिन करेगा, इस यकिन का टूटना भी .....।

बाकी कुछ आम श्रेणी के लोग होते हं जिनमे आनुवांशिक तौर पर यह एक बीमारी होता है, ये लोग कभी ना कभी मौत को गले लगा लेते हैं।

और कुछ प्रतिशत उन लोगो का होता है जो बिना मतलब आवेश मे आकर यह कदम उठाते हैं।

इन श्रेणियो को मैने आजतक के किये गये अध्ययन मे पाया है, हो सकता है कि कुछ छुट भी गया हो, जो आने वाले वक्त मे सामने आये।

आदत के अनुसार समाधान भी बता रही हूँ
१. यकिन सिर्फ़ खुद पर करें। क्योंकि एक आप ही है जो खुद को सबसे ज्यादा समझते हैं, कोई और भी आपको समझ सकता है, इस तरह की खुशफ़हमी ना पालें।

२. अगर को आप पर भरोसा करता है तो उसके सोच का सम्मान करे।

३.ये हमेशा मान के चलना चाहिये की जिंदगी दो पाटो मे बँटी है, पास या फ़ेल होना लगा रहता है।

४. किसी के लिये खुद को इतना भी न बदल दे कि अपनी पहचान ही खो जाये, क्योंकि जब वो आपको किसी कारणवश छोडेगा तो फ़िर आपके पास अपने लिये कुछ नही रहेगा।

५. अपनी प्राईवेसी का सम्मान करें।

६. अपनी गुणो-अवगुणो का विवेचन करते रहिये। ताकि किसी तरह की खुश-फहमी आपके दर्द का कारण ना बन जाये।

७. अगर आपको बार बार मरने का ख्याल आता है तो मेडिटेशन जरूर करें, पी के एम ने इसके लिये अलग से कोर्स भी बनाया है, या किसी भी तकनीक के मेडिटेशन को अपनाया जा सकता है। ( अब ये मत पुछियेगा कि पी के एम क्या है? भाई ये मेरी अपने तकनीक है)

८. गोल्डेन क्रिस्टल अपने साथ रखें। यह आपको मानसिक रूप से ठीक ठाक रखने मे मददगार।

९. अब भी बात नही बन रही है तो..... मैने अपनी सहेली को जो बात बोली, एक बार पढ लें :)।




शुक्रवार, 18 जुलाई 2008

भोजपुरी कहानी

कहानी सुनावे के पहिले ही बता देता नी कि हमरा कहानी लिखे के कौनो अनुभव नईखे, लेकिन ना लिखब त होईबो ना करी, एसे लिखल सुरु करतानी, लिखते लिखत नु आई। :)

लोग बाग कहेले कि आजु पुरनमासी के राती मे भुत-प्रेत के हमला होला, ई साची बाती हा ईया?
हा गुडिया, ई एक दम साची बाती ह, ऐसन क गो किस्सा हम देखले सुनले बानी, तहार बाबा जी के भी ऐसन क गो किस्सा देखे सुने के मिलल बा।
तबे गुडिया के बाबा जी बहरी से आ जानी अरू पुछने, अर्रे का बाती होत बा, हमरो के बताव लो।
बाबा जी ईया कहत रहली हा कि आजु के रात मे भुत-प्रेत के हमला होला, ऐसन रऊओ देखले सुनले बाने। एके बाद ओजुगा एगो सन्नाटा पसर जात बा, केहु कुछु नईखे बोलत, फ़ेर गुडिया खुदे बोले लाग तारी, बताई ना बाबा जी ई बात साच बा का?
बाबा जी, ईया के धीरे से बोलेनि, तु हु ई का काम करत रहेलु, अब ऊ डेरा जाई कि ना... आ झुठ बोलि के कि अईसन किस्सा नईखी देखले, तहार बाती के काटियो ना सकेनि, ई त भढिया सनिकट हो गईल।
राऊओ नु एकदम से कुछुओ ना बुझेनि, आखिर राऊर उमीर अब बितल जाता, ए परमपरा के एकनिये के तो निभाहे के बा नु, एकेनि के ना बताईब त भुत प्रेत प रऊआ जतना मन्त्र सिद्ध कईले बानी, एही गाऊआ के बचावे मे जतना मेहनत कईले बानी, सब व्यरथ चली जाई।
ह्म्म बतिया त तोहार ठीके बा, पर अभी गुडिय त कतन छोट बिया, अभीये से डेरावल ठीक नईखे लागत।
तब तक गुडिया बोल देले, बाबाजी काहे के डेराईब हम, हमहु ऊहे काम करब, जवन रऊआ करेनि, तनिकियो ना डेराईब, रऊआ बताई ना।
बाबाजी ईया पुजा वाला कमरा मे जाके पहिले हनुमान जी के माथा टेकेनि, फ़ेरु हनुमान जी के झंडा किहा आके ओकरो परिकरमा करेनि, फ़ेरु ओजुगे बैठिके कौनो मन्त्र पढी के, गुडिया के कुस से झाडेनि, तब जाके कहानी सुनावल शुरु करेनि।

ढेर दिन पहिले के बाती ह, जब ई गाँव नु गाँव ना रहल हा, एगो जंगल रहल हा, हमनी के पुरनिया (पुर्वज) ए जंगल के काटी काटी के एकरा के रहे लायक बनावत रहेलो, जे जतना जंगल के काटी के ओकरा के रहे लायक बना सकत रहे, ऊ जमीन ओही आदमी के हो जात रहे, एगो परिवार नु बहुअ बेहनती रहे अरू ऊ ढेर जमीन साफ़ कलेलस, दुसरा लोगन से ई देखल ना गईल, एगो राति, जब कुल्ही लो सुतल रहे, गाँव कुछु लोग मिली के ओ परिवार के पुरनिया के मार दिहल, अरू उनका लैकन के भगा दिहल, ओकरा बाद जतना जमीन ओ लो के रहे, सबे हडप लिहल। पुरनिया के आतमा दुख से भटके लागल, अरू ओ परिवार के सराप दे देलन कि, तहनि लो ए गाँव मे रहिओ के ना रही सकब लो, हमार बेटन के तहनि लो जतना दुख देले बाड लोग ओसे ज्यादा दुख मिली, तहनी लो के घरे कबो कौनो काम खुसी खुसी ना बीती, अरू ए गाँव मे केहु तहनि लो के साथ दी ही तो ओकरो घर मे कौनो दिन खुसी खुसी ना बीती।

तलेले गुडिया बीच मे टोक देलि, बाबाजी ई बतिया आतमा कैसे कहले होई, माने हाँव वालन के कैसे बुझाईल होई, काहे कि आतमा त लऊकेला ना नु?
ना ना गुडिया आतमा लऊकेला ना बाकि ऊ चाहो तो अपना होखे के सबुत दे सकेला।
अच्छा, अच्छा अब आगे बताईं।

पहिले त केहु ई बाती के ना मानल, सब लोग आपन-आपन काम मे लागल रहल अरू वक्त-बेवक्त ओ परिवार के साथे भी रहल।

फ़ेर का भईल बाबा जी, का ऊ आतमा के बाति साच निकलल, का गाँव वालन के परेसानी भईल.....?
हा, उहे तो बताव तानि, एगो राति खुब जोड जोड से पानी पडे लागल, अरू तब बरसाति के मौसमवो ना रहे, सुबह भईल, पानी बन ना भईल, ऐस करत करत क राति बीती गईल, लेकिन पानी परल बन ना होत रहे, अब लोगन के चुल्हा मे लौना-लकडी ना बाचि गईल रहे...

तलेले गुडिया के माई आके कहेलि, माताजी, बाबुजी खाना बनी गईल, चली सब खा ली।

माई अभी रह ना कहानी सुने के बा, बाद मे खाईब जा।

कहानी काल्हु सुनिह गुडिया, एहुतारि राती खा ई कुल्हु के बारे मे ना बतियावे के चाही, सापना मे डर लागी....

अरू गुडिया उनुकर ईया अरू बाबाजी खान खाये चल दे ता लो, बाकी गुडिया के मनवा मे त कहानी के आगे जाने के हुदहुदी ले ले बा.. लेकिन अब माई के कहला के राखी के काल्हु के इनतेजार त करही के पडी।

कहानी के अगिला हिस्सा

सोमवार, 7 जुलाई 2008

चलो थोडा बच्चा बन लें-२

छबी बलो को मेला नमछ्काल, आप छब मुजे ना जानते ऐं, मै छोटी गलिमा ऊँ।

आज ना मेले बले बईया का बल्थडे है... आप छब भी जानते ऐं उनको, मेले छे ज्यादा जानते ऐं, वो ना कई दिनो छे आपके दिलो पल दस्तक देते आ लहे हैं, उनके महफ़िल मे भी हम छब जाते ऐं औल मन्त्लमुग्ध ओ जाते ऐं, मेले बले बईया न सिल्फ़ इतना ही नही कलते बल्कि तेकनालऑजी पल भी लेक्चल देते हैं, जो कि मेले पल्ले बिल्कुल नही पलता ऐ... पल मेरे बईया मेले को ना बऊत प्याल कलते ऐं, अछक्लीमा बी किलाते ऐं... औल औल... बहुत छाली अच्छी बाते बी बताते ऐं।

इछलिये आज ना मै मेले बले बईया का बल्थ्डे मना लई ऊँ, आप छब बी मेले बले बईया क बल्थडे बनाओ... मेले छंग गाना गाओ...

एपी बल्थ्डे टु यु, एपी बल्थ्डे टु यु बईया... मे गॉड ब्लेछ यु विद हिज ऑल पावल :)
ऐब अ ब्लाछ्ट :)

मेले छंग छब गाना और बईया का बल्थ्डे मनाना

गुरुवार, 27 मार्च 2008

चलो थोडा बच्चा बन ले।

छ्बी बडो को नमछ्काल।
मेला नाम गलिमा ऐ औल मै तीन छाल की छोटी बच्ची ऊँ।
मुजको ना अछ्क्लीम बोत पछंद ऐ...तो मैने छोचा कि मै ऐछा का कलूँ कि ढेल छाली अछ्क्लीम एक छाथ मिल जाये... तो उछे मै लोज लोज का छकूँ।
तो मेने बली गलिमा को बोला कि अपने दोछ्तो छे मेले लिये अछ्क्लीम माँद ले... लेकिन छबछे एक एक कलके अछ्क्लीम मांदना बली मुछ्किल ता ताम ऐ, तो मेने छोचा कि छबको एक छाथ कबल कल देते हैं।
इछईये मे पोछ्ट ईख अई ऊँ।
मेले को छबी लोग एक एक अछ्क्लीम बेज देना, उछ्को मे लोज लोज खाऊँदी... औल मे अच्छे बच्चे की तलह पल्हाई बी कलूँगी... औल मे तबी तबी थोली छी छलालत बी कल लूँदी... औल मे ज्यादा बमाछी नई कलूँदी.. बछ थोली छी कल लूँगी।
थोली छी बमाछी तो कल छ्कते ऐ ना... कूँ कि छोटी ऊँ, तो मुजे इत्ती छुत तो मित्ती ऐ ना... वैछे बी बच्चे बलो कि तलह थोली ना बमाछी कलते ऐं... ना ही वो बलो कि तलह लते ऐं... वो तो बछ थोले से छमय मे खुछ ओ जाते ऐं।
मै बी ऐछी ई ऊँ.. कबी थोला छा गुछ्छा कलके फ़िल ताली बदा के किलकारी दे के अछने अगती हूँ... औल मै जदी छे छाला गुछ्छा भू के छबके छाथ खेने भी अगती हूं।
पल ऊ का है कि.. कुछ ओगो को अम बच्चो कि बाते छमझ मे ही नही आता... उन्को अगता ऐ कि.. अमे जदी से बआ ओ जाना चाईये.. ताकि हम बी बओ कि तलह.. जुठ, छच.. छ्ल कपत को छमज छके... अमाले बचपन को कतम कलके.. लोग अमे बला बनाना चाते ऐ.. आप कुद ई चोचो.. अम बच्चे नई रहेंगे तो.. आपको अपन बच्पन किधल मिएगा.. ओ खुछी अछ्क्लीम काते ऊए मित्ती ऐ.. वो किधल दिकेगी... जो कुछी प्याल कके मित्ती ऐ.. वो बी नई मियेगी... इछिये आप भी बलप्पन छोल के आओ थोले देल के लिये... औल च के अक्लीम काते ऐं। औल.... औल.. मे बाद मे बताऊँदी नई तो मेली अछ्क्लीम पिदल जायेदी।

बुधवार, 20 फ़रवरी 2008

हाँ कुछ तो पढ़ा

चलते चलते अनुराधा जी बोली ये पढा ? लिंक देकर तो वो गायब हो गयीं, मैने अनमने भाव से पढ़ना शुरु किया, माफ किजिये अनमना इसलिये कहा कि पढ़ने जैसा मन नही हो रहा था, फिर भी पढ़ना शुरु किया।
सुजाता जी ने अपने पोस्ट मे दो लिंक दिये हैं, उनके साथ आगे बढ़ गयी, और कुछ ही देर मे विचारो के लहर बनने बिगड़ने लगे।
अभी मुझे ठीक से समझ मे नही आ रहा है कि मैने क्या पढ़ा... और पढ़ा तो क्या पढ़ा? या जिसने लिखा लिखते वक्त उसके दिमाग मे क्या चल रहा होगा?
मैने जिस मनोदशा मे पढ़ा क्या वो स्थिती लेखिका के मनोदशा से तालमेल बिठा पा रहे हैं? इन सवालो के जवाब मे उलझ गयी हूँ।
अब बात ये रही कि, अगर मै ऐसी ही उलझी हो तो लिखने क्यूँ बैठी? और लिखा भी तो सिर्फ डायरी एक पन्ने मे रहने देती... जरूरत क्या है जग जाहिर करने की? इसका जवाब भी नही है मेरे पास।
खैर, मै जो सोच रही हूँ वो कि, "मै" जो कुछ हूँ, उसका मुल्यांकन अगर "मै अपने तरीके से नही कर सकती तो, मेरे होने का मतलब ही क्या है?
"मेरे" होने का सार्थक मतलब तो तभी निकल पायेगा, जब मै खुद को जान सकूंगी, लेकिन शायद समाजिक लोगो को यह बात पसन्द नही, उन्हे "मेरे" होनेपन के अस्तित्व का बोध होने से खतरा है, या खुद "मै" मेरे होनेपन की स्थिती को स्वीकार करने से घबड़ाती हूँ।
कल शाम पड़ोसी अंकल से ऐसे बात हो रही थी, बात ही बात मे वो अपने आपको सम्पूर्ण सामाजिक बताने के कोशिश मे लगे थे, उनके साथ उनकी सहधर्मिणी भी थी।
वो दोनो बता रहे थे, सामाजिक होना कितना मेहनत का, चातुर्य का, और सम्बल का काम है, ये हर किसी के बस की बात नही है, वगैरह वगैरह।
मैने उनसे पुछा कि" ऐसे मे आप अपने लिये, अपनी सोच के लिये वक्त निकाल पाते हैं?" क्या आप अपने ही अन्दर के भावो को समझ पाते हैं?" या आप अपने अपनो को, अपने बीवी बच्चो के मनोभाव समझ पाते हैं?"
इसके जवाब मे वो बोले, समझना क्या है, ये तो मेरे अपने हैं, ये तो मेरी हर बात मान ही लेंगे।
बात यह सोचने कि है, जो इंसान खुदको नही समझ पाया,वो समाजिक कैसे बनेगा? वहाँ तो बात और गम्भीर है, वहाँ तो ना जाने कई अस्तित्व हैं, जो खुद भी खुद को नही जानते, उन्हे कैसे किसी नियम मे बान्धा जा सकता है? य कुछ समझाया जा सकता है?
सीधी सी बात है, रोशनी देने के लिये, या किसी के घर का दीया जलाने के लिये अपने घर जलता दीया चाहिये ही चाहिये, इसके बिना काम नही हो सकता।
हमारी स्थिती भी कुछ ऐसी ही है, हम खुद अपनी स्थिती से या तो नावाकिफ हैं, या जानते हूए भी उसे ना जानने का ढोंग करते हैं, जैसा कि मनीषा जी कहती हैं कि "दादी के पैमाने ज्‍यादा संकुचित थे, मां के उनसे थोड़ा उदार और हॉस्‍टल के सहेलियों के थोड़ा और उदार। लेकिन पतित सभी की नजरों में रही हूं। जैसेकि शीशे के सामने चार बार खड़ी हो गई, या कोई रोमांटिक गाना गुनगुनाया, थोड़ा ज्‍यादा नैन मटका लिए, चलते समय पैरों से ज्‍यादा तेज आवाज आई, भाइयों के सामने बिना दुपट्टा हंसी-ठट्ठा किया तो दादी को मेरे अच्‍छी लड़की न होने पर भविष्‍य में ससुराल में होने वाली समस्‍याओं की चिंता सताए जाती थी।

यह समस्या एक अकेली मनीषा जी कि नही, लगभग हर लड़की की रही होगी, और मै यकिन के साथ कह सकती हूँ कि दादी के साथ भी रही होगी, इसके बावजुद दादी समझ नही पायी और सामाजिक बनते हूए, अपनी पोती को समाजिक बनाने के प्रयत्न मे लगी रहती हैं।
मेरी दादी अक्सर मुझे बताया करती थी कि उन्हे अमरूद खाना बहुत पसन्द है, इसलिये वो हमेशा चाहती कि माँ उन्हे थोड़ा ज्यादा दे दे, लेकिन ऐसा हो नही पाता था, अक्सर भाईयो को बड़ा हिस्सा मिलता, जिन्हे वो कुतर कुतर कर फेंक देते, इस तरह के कई किस्से वो बताती थी और उस वक्त मै उनकी आँखो मे वो नज़ारे देख सकती थी।
लेकिन इसके बावजुद दादी बेटे, बेटी के सीमा रेखा को पाट नही सकी और ना ही पोते-पोती की सीमा रेखा को, मै कभी कभी इसपर उनसे पुछा करती थी कि दादी आपको नही लगता, कि आप कुछ कमी कर रही हैं, तो उनका जवाब होता था, क्या करूँ समाज का यही दस्तुर है।
मुझे यह जवाब कभी पसन्द नही आया, आखिर ये कैसा दस्तुर है? जो खुद को ही समझ से परे रखने पर मजबुर करता है, जो खुद को भूलजाने पर मजबुर करता है। लोग कहते हैं "बीती ताहि बिसारि दे, आगे की सुधि लेहूँ" अर्रे बीती को भुलने से काम नही चलेगा, उसे अपने पास धरोहर की तरह रखना चाहिये, ताकि आगे वो पिछला अनुभव काम आये।
हमारे समाज मे यही गड़बड़ है... हम अपने उन कटु अनुभवो को याद करके रोते तो हैं, पर आगे ऐसा ना हो इसका प्रयत्न नही करते।
हम "मै" कि खोज मे रहते हैं, पर एक तरफ समाज के बीच उस "मै" से किनारा कर लेते हैं।
विशेषकर यह बात लड़कियो के लिये लागु होती है, एक पीढ़ी दुसरी पीढ़ी को अपने "मै" के खोज मे आगे नही बढ़ने नही देती, उन्हे हमेशा ना जाने किस समाज का भय खाये रहता है, वो भूल जाती हैं कि, जिस समाज मे "मै"(अस्तित्व) ना हो उसके साथ जीना ही कितना आधारविहीन है, और फिर कोई "मै" इस समाज को मानने से इंकार कर देता है तो उसे आसामाजिक तत्व का तगमा दे दिया जाता है या पतित कह दिया जाता है।

हाँ पर मुझे कहना पड़ेगा तुम्हारी नज़र मे मै पतित ही सही, पर मैने आज जब अपने अस्तित्व को पहचाना है तो मुझे तुमसी बनने की चाहत भी नही रही, बैठी रहो किसी के लिये सामाजिक बनने कि चाहत मे, "मै तो" आज खुद के लिये जीना चाहती हूँ।
ताकि आज मै कह सकूँ कि "हाँ यह जो मै हूँ वो किसी समाज की धरोहर नही, बल्कि मै खुद एक नये समाज के सृजन मे प्रयत्नरत हूँ, मै वो अस्तित्व हूँ, जो मुझसी होकर जीना चाहती हूँ, इस गगन को अपने पंखो से नापना चाहती हूँ, इस दुनिय को अपने रस्मो-कवायदो के अनुसार देखना चाहती हूँ, मेरे अन्दर किसी और सी बनने की ललक नही है, ना हि मै चाहूँगी कि "तुम" मुझसी बनी, "तुम"भी तो एक अस्तित्व हो मेरी तरह ही, जाओ तुम भी अपनी एक दुनिया बनाओ।"


बुधवार, 23 जनवरी 2008

भारत रत्न के सच्चे हकदार

जब दलाल बन गया हलाल स्ट्रीट तो सभी लोग अपने अपने शेयर बेचने मे लगे थे, हालात देखकर ऐसा लग रहा था कि सभी लोग जब बेचने मे लगे हैं, मार्केट सुधरेगा कैसे?
कोई तो खरीददार भी होना चाहिए? ऐसी हालत मे जीतू भाई और मै खरीदने मे लगे थे, हो सकता है हमारे ही खरीदने से मार्केट सुधरा हो... :D

ऐसे मे भारत रत्न के असली हकदार तो हम हूये ने, जाने और कितने लोग हलाल होते और हमने बचा लिया :)



गुरुवार, 25 अक्टूबर 2007

गाव के कुछ मजेदार किसे

बहुत दिन से हम कुछुओ नईखी लिखले, आज सागर भईया, बोलनी हा कि व्यंग लिख... त हम ई सोचनी हा कि ठीक बाती बा, हम्हु व्यन्गो के अजमाई लेतानी, का जाने की लिखे आईये जाऊँ,लेकिन ई बाती बा की, हमरा आजु ले ना बुझाईल की ई आखिर व्यंग होला का?काहे कि कौनु कौनु बतिया प जब कुल्हिये लोग हँसेला हमरा हँसिये ना आवेला, अरू कौनु कौनु बतिया प हमरा अतना हँसी आवेला अवरू केहुके आईबे ना करेला।अब ई बाती से हम बड़ी मुश्किल मे पड़ी गईल बानी कि आखिर ई व्यंग होला का? अब ई केहु समझाई दी ही तबे नु हमहूँ व्यंग लिखबी, तबले हम एगो मजेदार किसा बता देत बानी...का जाने कि इहे व्यंग होखे...

हाँ कुछु कहे के पहिले ईहो बता देत बानी की, ई किसा हम कबो अपना आँखिन नईखी देखले, बस सुनल सुनावल बतिया हटे-

हमरा बलिया जिला मे एगो गाँव बा, ओकर नाम ह मझऊँआ गाँव, ओजुगा के बारे मे किसा ह कि,
एक हाली, एगो भईस एगो कूँआ मे गिरी गईली, अब गाँव के लोग का कईल कि, घासी बटोर के, भईसिया के देखावे लागल...

चु चु... आ जा... अर्रे आ जा ना....

लेकिन भईसिया ना आईल... गऊआ के लोगवा के सामने ही भईसिया डूबी गईल... अरू गऊँवा के लोग कहे लागल कि, लागत रहल हा कि... बुझात रहल हा कि भईसिया के ढ़ेरे पियासी लागी गई रहल हा... एसे ऊ खाना खाये ना आके पानी पिये चली गईली हा..... ।


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अभी ई किसा निमन लागि तो फेरू ऐसन एगो किसा ले के आईबी...:)