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कुछ दिनो पहले अनुप जी का लेख पढा जीवन अपने आपमे अनमोल है लेख का अभिप्राय है "आत्महत्या क्यों ?"
मैने पढा और उसी वक्त उनसे बात हूई कि इस पर अभी कुछ और सोचने की जरूरत है, इसके बाद बात आयी गयी रह गयी, मतलब कि मेरी व्यस्तता मे निकल गयी, आज रविवार है, मानसिक रूप से आज मेरी छुट्टी का दिन है, और आज तबीयत भी कुछ ऐसी है कि बस दिमाग चल रहा है, इसलिये मै बैठी हूँ और दिमाग चल रहा है, आज बैठे-बैठे कई अनछुए पहलुओ पर रोशनी डालने का मन हूआ, कुछ दोस्तो को चिढाया, किसी को वर्चुअल खाना खिलाया, और वादा असली वाला चॉकलेट खिलाने का लिया गया, कुछ दोस्तो से फोन पर भी गपशप हुई, प्रोसेस यही था.. :)
तभी एक सहेली बातो-बातो मे ही रो पडी, कहने लगी कि गरिमा, जी करता है मर जाऊँ।
मर जा,
वो चुप हो गयी, शायद ऐसे जवाब की उपेक्षा नही थी उसको।
एक न एक दिन मरना ही है, आज ही क्यों नही, तू क्या सोचती है? किसी को तेरे जाने से परेशानी होगी? मेरी जान, यहाँ तेरे पिछे लोग कुछ दिन तक आँसु बहायेंगे और फिर अपना रास्ता नापेंगे, और ज्यादा केस हो गया तो, लोग कहेंगे जरूर लडकी ने कोई पाप किया था, किसी को मुँह दिखाने के काबिल नही रही तो बेचारी ने मौत को गले लगा लिया, जिन लोगो के कारण तू जी नही पा रही है, ढंग से ये लोग मरने भी नही देंगे। तेरी बहन रास्ते मे निकलेगी तो लडके परेशान करेंगे, १०० सवाल होंगे, जिस बहन पर तू जीते जी आँच नही आने देती, मरने के बाद क्या करेगी? तेरी आत्मा ऊपर से देख-देखकर रोयेगी, फ़िर मर कर कहाँ जायेगी?.. पर तू परेशान मत हो, तू जा और मर जा।
अब उसकी बारी थी, उसने कुछ बोला नही... काफी देर तक हमारे बीच मौन ही बोला, शब्द नही बोले, बोलते भी कैसे, शब्दो की एक सीमा होती है, पर मौन की सीमा नही होती, वो हर अकथनीय को कथनीय बना देता है, बस उसको समझने के लिये आपका दिल से मौन होना जरूरी है, जहाँ विचार भी खत्म हो जाये वहाँ से मौन की भाषा शुरू होती है, तो खैर मौन हम दोनो के बीच मे बोला, फ़िर चुप्पी तोडी गयी, हम दोनो ही सामान्य हो चुके थे, अब बारी थी शब्दो कि,
गरिमा तू ठीक कहती है, मौत इलाज नही है, परेशानियों के लिये, क्या करूँ, मै कुछ और चाहती हूँ मेरे सपने कुछ और हैं, अपने चाहते कुछ और हैं।
जो दिल कहे, दिल की आवाज गलत नही होती।
वो कैसे?
देख यार, जिन्दगी के कई पहलु होते हैं, हम दोनो ने ज्यादा नही सिर्फ़ कुछ महीने एक साथ बितायें हैं, उसके पहले हम एक दुसरे अंजानसे थे, अब मिलने के बाद बिछडने के बाद, हमारा रिश्ते मे कुछ और बात है, हम दोनो का जीवन हमारा ही क्यों, सभी का जीवन कई रंग ढंग से मिलकर बना है, मै सोचती हूँ, आज के ६ साल पहले मै क्या थी, और आज क्या हूँ तो बहूत फ़र्क महसुस होता है, आने वाले ६ साल बाद क्या होगा, उसकी कल्पना मात्र की है, एक खाँका खींच रखा है, जो जो करना है, मान ले कि वो पूरा नही होता तो क्या करूँगी?
गरिमा मै तुम्हे जानती हूँ, तुम मेरी तरह नही सोचोगी।
हाहाहा, फिर तुम नही जानती, मौत के बारे मे नजरिया ही अलग है, मै कभी आत्महत्या नही करूँगी पर लोगो को, करने पर मजबूर कर दूँगी।
व्हाट?
सॉरी, आत्महत्या नही, उन बंधनो की हत्या जिसके कारण मूझे मेरे ख्वाब नही मिल रहे हैं, मेरा अपना ही नजरिया है, मैने प्लान किया है किन रिश्तो को बनाना है, किन से दूर रहना है, किसको बचाना है, किस पर कितना वक्त देना है, किसको कब स्टाप करना है। अब हमारे सफलता के बीच कोई अच्छी कडी है तो ये रिश्ते हैं, और असफलता यानि की हमारा पैर खींचने वाले भी यही हैं, ऐसे मे उनको स्टॉप कर दूँगी। सब कुछ प्लान्ड है, हाँ इस बीच स्वभाविक मौत आ जाये तो उस पर बस नही है, और ना ही मुझे उस मौत से डर लगता है, बेफ़िक्र हूँ मै।
फिर वो बोली गरिमा मेरे जैसे लोग कमजोर होते हैं ना जो आत्महत्या करने का फ़ैसला कर लेते हैं?
तभी उसकी मम्मी ने उसे बुलाया, और उसे जाना पडा, मैने उसे वादा किया जवाब आज ही भेजुँगी, तभी अनुप जी की पोस्ट याद आ गयी, अब अपन ठहरे बिजनेस करने वाले एक साथ दोनो काम करेंगे, सो वही किया जा रहा, समय की बचत हो जायेगी, कुछ और खुराफ़ात करने के लिये।
अनुप जी के पोस्ट से
"अंकुर बता रहे थे एक दिन कि आई.आई.टी. कानपुर में कुछ दिन पहले आत्महत्या की थी वह खुद बड़ा हौसलेबाज था। कई दोस्तों को अवसाद में जब देखा तब उनके साथ रहा। उनको जीने का हौसला बंधाया। अवसाद के क्षणों से उबारा। बाद में किसी के प्रेम में असफ़ल होने के कारण योजना बना के अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली।"
मैने देखा है ऐसे ही लोग आत्महत्या करते हैं, जो कि सबका हौसला-अफ़जाई करने मे अग्रणी है, तनिक सी देर मे बस वो मौत को गले लगा लेते हैं, कारण आगे बताऊँगी।
अनुप जी आगे कहते हैं कि "बड़ा जटिल मनोविज्ञान है इस लफ़ड़े का। लेकिन मुझे जो लगता है वह यह कि लोग दिन पर दिन अकेले होते जा रहे हैं। विकट तनाव से जूझने वाले के निकट कोई नहीं होता।"
ऐसा नही कि अकेले रहने वाले लोग आत्महत्या नही करते पर, ये आँकडा गलत है अक्सर आत्महत्या वो करते हैं जो सबके साथ रहते हैं, वो मेधावी होते हैं, जो हमेशा खुद को सुलझा हुआ समझते हैं, जिन्हे लगता है कि उनके अपनो की संख्या बहुत ज्यादा है।
अनुप जी आगे कहते हैं कि "आत्महत्या करने वाले ज्यादातर वे लोग होते हैं जो अपने व्यक्तिगत जीवन के लक्ष्य पाने में असफ़ल रहते हैं। इम्तहान में फ़ेल हुये, प्रेम विफ़ल हो गया, नौकरी न मिली। अवसाद को पचा न पाये। जीवन को समाप्त कर लिया। "
ये बात सही है, पर इसमे भी उन लोगो की प्रतिशतता ज्यादा है जो अचानक से विफल हुए।
अब मै अपनी बात को समझा रही हुँ कि मेरे ऐसे कहने का कारण क्या है?
अक्सर वो लोग जो समझते हैं कि वो खुद बहुत सुलझे हूए है, उन्हे कभी यकिन ही नही होता कि वो कभी असफ़ल होंगे, वो हमेशा कहते हूए मिल जाते हैं, मेरा असफ़लता से दूर दूर का नाता नही है, जब ऐसे लोग अचानक टुटते हैं तो उनका वजूद उनसे छिन जाता है, मेरी मित्र भी इसी श्रेणी मे आती है, वो हमेशा कहती रहती थी, मैने कभी असफ़लता का मुँह नही देखा, इस बात का बहुत यकिन था उसको कभी वो असफ़ल नही हो सकती, हर श्रेणी मे वो आगे रही, पढाई लिखाई, दोस्ती, इत्यादि।
अब उसे अचानक से जो भी असफ़लता का सामना करना पडा हो, उसे तोड देने के लिये काफ़ी है, क्योंकि ऐसे वयक्तित्व कडक हो जाते है, एक सहज सा दंभ आ जाता है और जब वो टुटता है तो दुसरा रास्ता नही दिखता, वो समझ नही पाते कि जिन्दगी मे पास या फ़ेल लगा रहता है, जो इस बात को समझ नही पाते वो पलायन कर ही जाते हैं।
दुसरे श्रेणी के लोग जो पलायन करते हैं वो हैं जो दुसरो के लिये जीते है, अपने लिये कुछ नही माँगते, और एक दिन जब उनको खुद की जरूरत होती है,तो "वो" जिनके लिये "वो" जीता आया है, वो पिछे हट जाते हैं, फ़िर उसको लगता है कि मेरा जीवन व्यर्थ हो गया, ऐसे लोग भी आत्महत्या के शिकार बनते हैं।
तीसरी श्रेणी आत्महत्या करती है, वो है किसी ऐसे से यकिन टूटना जिसके लिये वो जीता मरता आया है, यह यकिन अपने प्रेमिका, माँ-बाप किसी पर भी हो सकता है, उस शक्स को लगता है कि दुनिया चाहे कुछ भी कह ले यह शक्स मुझपर यकिन करेगा, इस यकिन का टूटना भी .....।
बाकी कुछ आम श्रेणी के लोग होते हं जिनमे आनुवांशिक तौर पर यह एक बीमारी होता है, ये लोग कभी ना कभी मौत को गले लगा लेते हैं।
और कुछ प्रतिशत उन लोगो का होता है जो बिना मतलब आवेश मे आकर यह कदम उठाते हैं।
इन श्रेणियो को मैने आजतक के किये गये अध्ययन मे पाया है, हो सकता है कि कुछ छुट भी गया हो, जो आने वाले वक्त मे सामने आये।
आदत के अनुसार समाधान भी बता रही हूँ
१. यकिन सिर्फ़ खुद पर करें। क्योंकि एक आप ही है जो खुद को सबसे ज्यादा समझते हैं, कोई और भी आपको समझ सकता है, इस तरह की खुशफ़हमी ना पालें।
२. अगर को आप पर भरोसा करता है तो उसके सोच का सम्मान करे।
३.ये हमेशा मान के चलना चाहिये की जिंदगी दो पाटो मे बँटी है, पास या फ़ेल होना लगा रहता है।
४. किसी के लिये खुद को इतना भी न बदल दे कि अपनी पहचान ही खो जाये, क्योंकि जब वो आपको किसी कारणवश छोडेगा तो फ़िर आपके पास अपने लिये कुछ नही रहेगा।
५. अपनी प्राईवेसी का सम्मान करें।
६. अपनी गुणो-अवगुणो का विवेचन करते रहिये। ताकि किसी तरह की खुश-फहमी आपके दर्द का कारण ना बन जाये।
७. अगर आपको बार बार मरने का ख्याल आता है तो मेडिटेशन जरूर करें, पी के एम ने इसके लिये अलग से कोर्स भी बनाया है, या किसी भी तकनीक के मेडिटेशन को अपनाया जा सकता है। ( अब ये मत पुछियेगा कि पी के एम क्या है? भाई ये मेरी अपने तकनीक है)
८. गोल्डेन क्रिस्टल अपने साथ रखें। यह आपको मानसिक रूप से ठीक ठाक रखने मे मददगार।
९. अब भी बात नही बन रही है तो..... मैने अपनी सहेली को जो बात बोली, एक बार पढ लें :)।