वैलेनटाइन डे आ गया है... और हवा मे खूब गर्मजोशी है... वाह वाह। गर्मजोशी उन दिलों मे हैं, जो अपने प्यार का पहले-पहल इज़हार करना चाहते हैं, और उनमे भी हैं, जिन्होने कर रखा है बस कोई अच्छा सा गिफ्ट देकर उसे पुख्ता करना चाहते हैं, और उनमे भी है जो इस हंगामे को रोक देने के लिये कुछ भी करने की पूरी तैयारी के साथ हैं। क्या मौसम है... पर जनाब गर्मजोशी वही पर नहीं है जहां होना चाहिये... प्रमाण के तौर पर
पिछले १० दिन से मैने अपने परिचितो की श्रेणी मे ४० साल और इसके ऊपर के सभी दम्पतियों को पूछ लिया कि उन्होंने इस दिन की तैयारी मे क्या किया... जवाब लगभग ऐसा था एक-दो छोड़कर...
अरे बेटा अब इस उम्र मे हम कहां इस दिन को मनायेंगे
अब वो बात कहां
अब तो बस दिन कट रहे हैं
उनको हमारी इतनी फिक्र नही, हम कुछ कह भी दें.. तो... कोई फर्क नही पड़ेगा
श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श ये बातें भी ऐसे खुलेआम की जाती हैं
ये भी कोई दिन है पता ही नही था
अरे ये अंग्रेजों ने तो ......
हद हो गयी... मै सोच रही थी, जिसके साथ ता-उम्र गुजारी है और बाकी की गुजारनी है उससे प्यार नहीं? और अगर है तो इजहार करने मे इतनी झिझक क्यों? क्या प्यार सिर्फ २० की उम्र की धरोहर है जो ४० तक जाते जाते पुरानी पड़ जाती है? जिसे याद करने मे भी शर्म आती है?
मै तो समझती थी कि प्यार अत्यंत ही पवित्र होता है और इसकी पवित्रता वक्त के साथ और गहरी होती जाती है... लेकिन प्यार तो कलंकित, अपमानित, निरूत्तरित है.. चलिये जाने देते हैं, मुझे इसका जवाब चाहिये भी नहीं... मै कुछ और ही सोच रही हूँ। क्योंकि बड़े लोगो के बीच मे बच्चे को नही पड़ना चाहिये इसलिये मै बच्चों मे बीच मे ही पड़ती हूँ।
वैसे बड़े हो या बच्चे प्यार कलंकित, अपमानित होता ही है... पर सवाल उठता है क्यों? क्यों? हमारे देश मे भी प्यार इतना अपमानित हो गया है? प्यार की पवित्रता मिट गयी है/रही है... बचा है तो... प्यार के नाम पर गंदगी, अश्लीलता, बेवफाई और निरूत्तर होता प्यार...
इससे कुछ याद आ रहा है कि कुछ दिनो पहले पड़ोस मे किसी को बेटा पैदा हुआ, कुछ दिनो बाद मै मिलने गयी तो भईया भाभी ने कहा कि बेटा जरा इसका औरा देखना, मैने कहा कि बच्चो के औरा तो कुछ खास नही होते क्योंकि औरा तो मन कि गतिविधियों पर ज्यादा चलता है और बच्चे मे इसकी कमी पायी जाती है.. फिर भी उनकी जिद्द पर यूँ ही थोड़ा चेक किया और जो समझ मे बताया... उन्होने हँसते हुए कहा कि ये बताओ ये सीधा साधा होगा या बदमाश? मैने पूछा कि आपको क्या चाहिये? उन्होने कहा कि मुझे तो बदमाश ही चाहिये सीधे साधे लड़के अच्छे नही लगते... लड़का वही अच्छा लगता है जो १०-१२ गर्ल फ्रेन्ड पटाये, मार पीट करे....
वेल, यह उनकी पर्सनल च्वॉइस है.. मै नही कहती कि सभी लोगो की होगी, पर इस बात पर इंकार कौन कर सकता है कि ऐसी च्वॉइस दूसरे किसी की नहीं होगी?
ऐसे परिवेश मे जो लड़का पलेगा वो किस तरह के भविष्य को निरूपित करेगा... कोई भी अच्छे से अंदाजा लगा सकता है। उस लड़के के लिये प्यार महज खिलवाड़ ही होगा और कुछ नहीं...
ऐसी लड़की के लिये भी माँ-बाप की अपनी च्वॉइस होती है... वो सीधी संस्कारी, इत्यादि इत्यादि होनी चाहिये... लड़की जिस परिवेश मे पलती है (अधिकांशतः) प्यार उसके लिये एक हौवे से कम नही होता... घर मे लोग प्यार का नाम तक आने नहीं देते, लड़की अपना कोई अनुभव अपने अभिभावक से बांट नही पाती, इस कंडीशन मे वह बाहर मारी मारी फिरती है/फिरेगी ही... आखिर कहीं ना कहीं उसे कुछ ना कुछ तो चाहिये और ऐसे मे उसे किसी ऐसे लड़के का साथ मिल जाता है... जो लड़की के भावना को महज खिलवाड़ ही समझता है... और जो होता है वो मुझे बताने की जरूरत नही है...
पर इसमे गलती किसकी है? इस तरह के परिवेश मे पले युवक किसी पार्क मे प्यार की पवित्रता को नज़र-अन्दाज़ करते नज़र आ जायें तो इसमे कोई आश्चर्य नही होना चाहिये... खराबी तो नीव मे मिली है उपर से कितना भी लीपा पोती कर लो बात नही बनेगी।
अक्सर मुझसे टीनेज लड़कियाँ मिलती हैं और अपने कुछ अनसुलझे सवालों के जवाब मांगती रहती हैं, सवाल ऐसे कोई भारी भरकम नही होते जिनका जवाब उनके माता पिता नहीं दे सकते... मै अक्सर उनको कहती हूँ कि आप अपने ममा से ही पूछ सकती थी... तो जवाब होता है कि ना दीदी वो तुरन्त मुझे गलत समझ लेती हैं...
पता नहीं, क्या माँ इस दौर से नही गुजरी होंगी? जो बदलाव शारिरिक, मानसिक हारमोनल स्तर के दौर से यह लड़की गुजर रही है... उसकी माँ को भी गुजरना पड़ा होगा और आने वाली प्रत्येक पीढ़ी को गुजरना पड़ेगा... तब माँ बेटी में ऐसा रिश्ता क्यों नहीं बन पाता कि अपनी बेटी को इस नाजुक दौर मे पूरी सहायता दे, उसका पथ प्रदर्शक बने ना कि एक डिक्टेटर बन जायें।
मातृत्व समुदाय मुझे माफ करें पर अधिकांश लड़कियों की माँ यही काम करती हैं... जबकि माँ बेटी का रिश्ता अत्यंत मधुर होना चाहिये... इस रिश्ते पर अगर यूंही डिक्टेटरशिप लगी रही तो प्यार की स्थिती इससे भी कहीं ज्यादा भयावह होगी। यह सोच जब तक नही बदलेगी कि बेटा भी बदमाश नही शरीफ हो, इज्जत करना जाने, प्यार की पवित्रता को पहचाने वह अपने अनुभव अपने अन्दर हो रहे बदलाव को समझे तब तक अच्छे युवक के जन्म लेने का सवाल ही नही उठता, यही बात बेटी के लिये भी लागू होती है। अगर ऐसा नही हुआ तो प्यार का जो अर्थ अनर्थ निकलेगा/निकल रहा है वो शर्म-सार करता ही रहेगा... चाहें कितने भी बन्दिशें लगा दी जायें... जब तक नींव मजबूत ना हो इमारत को तो ढ़हना ही है...
समर्थ, शक्तिशाली, चरित्रवान युवा आसमान से उतर कर नहीं आयेंगे ना ही उनको जबरदस्ती ऐसा बनाया जा सकेगा... उसके लिये शुरूआत करनी पड़ेगी अपने ही घर से... वरना कितने भी दल बन जाये इस अनर्थ के अर्थ को रोक देना किसी के बस का नही हो सकता और जो होगा/हो रहा है उसके जिम्मेदार आप ही होंगे/हैं।
चरित्र कोई घूँटी नहीं हैं जिसे पिला दिया जाये और पीने वाला आत्मसात कर ले। बल्कि चरित्र हनन क्यों हो रहा है इसके कारण को जानकर निवारण की आवश्यकता है... वरना प्रेम दिवस यूँहीं अपमानित होता रहेगा वो भी उस उस देश मे जहाँ राधा कृष्ण की वन्दना की जाती है।
चलिये बहुत हो ली भाषण बाजी अब हम जा रहे हैं... अपने पापा जी को वेलेनटाइन डे विश करने... इसके लिये हमको डंडे नही पड़ने वाले बल्कि बहुत मजा आने वाला है... ये अलग बात है कि पापा जी के अचानक आये बिजनेस टूर के कारण सारे प्लानिंग धरी की धरी रह गयी... पर हम तो रोज रोज वेलेनटाइन डे मनाते हैं, वो भी नये नये अंदाज मे... वो हम आपको फिर कभी बतायेंगे अभी थोड़ी सी ममा पापा जी को तंग करके मजे लेने जा रहे हैं।
खुला आकाश, महकता पवन, खिलखिलाता मौसम... और अचानक कही दर्द, रूठता मौसम, सिमटता जीवन, ये सभी रूप जीवन के ही रूप है, एक दुसरे से अलग पर एक दुसरे के बिना अधूरे
शनिवार, 14 फ़रवरी 2009
बुधवार, 21 जनवरी 2009
शेयर बाजार, मै और नारदमुनि
ओबामा को लेकर हम सब कल बहूत उत्साहित थे। सारे ब्रोकर्स कल बोल रहे थे, मैडम खरीद लिजीये कल बाजार पक्का बढ़ेगा। अच्छा जी, हम भी उत्साहित हूए, पर थोड़ा कम, सिर्फ ट्रेडिंग के लिहाज से खरीददारी मे लग गये, शाम तक बाजार ने कुछ अच्छा मोड़ लिया निचे से ४० प्वाईंट निफ्टी आगे आई तो आधी प्रोफिट घर आई.. और आधी ओबामा जी को सलामी देने के लिये रख ली... पर रात से मेरी सूरत लटक गयी क्योंकि मेरी खरीद F&O की थी, अक्सर मै १५ तारीख के बाद इसमे हाथ नही डालती। पर ओबामा की सलामी मे डाला हुआ हाथ... हाथ जलने का डर सताने लगा। अब हाथ जल जाये तो कोई सलामी कैसे इसलिये रात भर जोड़ती रही कि इतना % गिरेगा तो इतने का लॉस होगा। पापा जी ने धीरज रखवाया कि कोई बात नही आज जितना आया है उतना जायेगा.. जाओ सो जाओ... यकिन मानिये सपने मे भी यही देखा कि बाजार तो गया। सुबह जब बाजार खुला तो राहत की साँस ली... ऐसा कुछ नही था जो सोचा था... १% कि प्राफिट के साथ f&o section को खाली किया और उसके बाद ऑप्शन मे पुट खरीदे.. और अभी.. एकदम मजे ले रही हूँ, ओबामा जी को सलामी तो दे दी, पर अपने तरीके से :)
अब इतनी टेन्शन के बाद नारद जी की कहानी झेलिये...
नारदमुनि का नारदनामा और शेयर बाजार
नारद मुनि अपनी आदत के अनुसार यायावरी में स्वर्ग पहुँच गये। यहां पर नारद जी ने देवराज को दुखी पाया। देवराज इन्द्र को दुखी देख नारदमुनि पहली बार अपना तखल्लुस नारायण नारायण का उच्चारण भूल गए। इसे गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज कराया जा सकता है। प्रणाम देवर्षि, माफी चाहता हूँ पर नारद जी ने अपनी गलती स्वीकार की कि वे नारायण नारायण कहना भूल गए इसलिए उनका ध्यान न खिंच सका। देवों के देव इन्द्र ने बतलाया कि अब मृत्युलोक वासी इंसान उनकी पूजा-अर्चना से विमुख होता जा रहा है जिससे देवताओं का वर्चस्व मृत्युलोक में खतरे में पड़ गया है।
नारद मुनि अपनी त्रिकाल दृष्टि से देखकर बतलाते हैं कि आजकल मृत्युलोक निवासी शेयर बाजार में होने वाले उतार चढाव के कारण भयंकर रूप से परेशान हैं और यह परेशानी शेयर बाजार के न चढ़ने के कारण इतनी अधिक बढ़ गयी है कि वे सांस तक खींचना भूल जाते हैं, फिर भला फिर पूजा-अर्चना भला कैसे याद रह सकती है। इस पर देवराज और चिंता में डूब जाते हैं। इतना डूब जाते हैं कि नारदमुनि उनके सामने साकार हैं, वे यह भी भूल जाते हैं। तब नारद मुनि फिर एक बार नारायण नारायण गुंजायमान करते हैं। और एकाएक झटके से देवेन्द्र चिंता से बाहर आते हैं।
नारदमुनि देवराज को सलाह देते हैं कि "देवराज आप कुबेर को आदेश करें कि वे शेयर बाजार को मंदी के इस भीषण प्रकोप से बचायें, अपना धन शेयर बाजार में झोंक दें और किसी भी तरह से बाजार को मंदी की राह से निकाल कर तेजी की राह पर सरपट दौड़ायें और महाराज कुबेर के इस करतब की कथा मृत्युलोक में इंडिया टीवी, आईबीएन सेवन सरीखे चैनलों के माध्यम से प्रचारित करें, वे चैनल इसी प्रकार की कथाओं के प्रसारण में निपुण हैं और सिद्धता प्राप्त कर चुके हैं जिससे उनकी टी आर पी भी तेजी से बढ़ रही है।
कुबेर कथा में यह बतलाया जाये कि महाराज कुबेर द्वारा मृत्युलोक निवासियों का यह दुख नहीं देखा गया क्योंकि वैसे भी उस लोक के वासियों को तो अंतत: मर ही जाना है तो उनका बार बार मरना असहनीय हो रहा है, जिससे देवताओं के प्रति मृत्युलोक वासियों की आस्था फिर मजबूत होगी और वे फिर से देवताओं की इबादत में मशगूल हो जायेंगे। वैसे भी पृथ्वी पर भारत के सिवाय तो देवताओं की कोई ज्यादा पूछ है नहीं, वहां से भी खत्म हो गई तो फिर देवताओं को अमर होकर भी क्या लाभ मिलेगा इसलिए यह तात्कालिक उपाय किए जाने चाहियें।
वो एक उक्ति है न कि विनाशकाले विपरीत बुद्धि तो नारदमुनि की सलाह ने तुरंत असर किया और देवराज इन्द्र को यह युक्ति पसन्द आयी और उन्होने फौरन कुबेर को आदेश दे दिया।
उधर नारदमुनि नारायण नारायण अलापते हुए पाताल लोक में भी इस बाबत हंगामा मचा कर सलाह दे आये। इससे एक बार फिर स्पष्ट हो गया कि इंडिया टीवी, आई बी एन सेवन सरीखे चैनलों की संकल्पना नारदमुनि के किरदार से प्रेरित होकर पृथ्वीवासियों ने की होगी। इधर नारद जी ने दानवासुर को भी इस गुप्त तथ्य की जानकारी लगे हाथ दे दी कि मृत्युलोक वासियों में देवराज की टी आर पी कम हो रही जिसके मूल में गिरता और तेजी से गिरता शेयर बाजार है और यही वह अवसर है जब रावण के कुकर्मों द्वारा खत्म हुई टी आर पी को दोबारा से गेन करने के सुअवसर का लाभ उठाया जा सकता है तो दानव भी भारतीय शेयर बाजार में कुछ इस तरह कूद पड़े कि कहना पड़ा पांचों घी में और सिर कड़ाही के अंदर।
दानवासुर ने भी सोचा कि यही अच्छा समय है जब अपनी टी आर पी में बढ़ोतरी की जा सकती है और इंसानों के कमजोर से नाजुक दिल पर बाजार को संभाल कर कब्जा किया जा सकता है। एक बार मृत्युलोक निवासी हमारे झांसे में फंस गये तो फिर दानवों को स्वर्ग पर कब्जा करने में कोई अड़चन नहीं आयेगी।
दोनों ही पक्षों के फाइनेंसियल एक्सपर्ट्स अपनी अमरता का लाभ लेते हुए मृत्युलोक पर कूद पड़े क्योंकि अगर वे पारंपिक यातायात सेवा से आते तो देर हो जाती और उतर आयें और उन्होंने शुरू कर दिया अपना शेयर बाजार सुधारो अभियान। जहां तक उन्हें समझ आया उसके अनुसार अमेरिका में चल रही वित्तीय समस्या, क्रुड के रोजाना बढ़ते गिरते भाव, महंगाई का सुपरक्वीन बनते जाना, कम्पनियों का दिवालिया होना, मौसम की मार, करेन्सी मे उठाव-पटक इत्यादि ढेरों कारण हैं, जिससे शेयर बाजार रसातल में समाता जा रहा है।ं
दिव्य शक्तियों से सराबोर दोनों पक्षों ने सोचा कि क्यों न पहले अमेरिका के वित्तीय संकट को पहले हल किया जाये और वे बेचारे पैसों का इन्तजाम करते गये... करते गये... नतीजतन अमेरिका के पास लिक्वेडिटी ज्यादा हो गयी जिससे महंगाई बढ़ने लगी, महंगाई के चढ़ने का सीधा असर वॉल स्ट्रीट पर दीखने लगा जिससे देश दुनिया के शेयर बाजारों में हड़कम्प बच गया .... चारों तरफ त्राहि माम, त्राहि मामा, त्राहि बाप, त्राहि चाचा इत्यादि की चीखें सुनाई पड़ने लगीं जिससे देव-दानव अपने अपने खेमे मे परेशान हो गये... अब क्या होगा ? आखिर यह दांव उनके लिए उल्टा कैसे पड़ गया ...
एक बार फिर मृत्युलोक का सरकारी टूर बनाया गया और एक नई सोची समझी नीति के अनुसार इस बार क्रूड कि कीमतों को स्थिर किया पर इससे भी ज्यादा सकारात्मक असर दिखाई नहीं दिया सिर्फ चंद रिफाईनरीज शेयर्स की दशा ही सुधरी। पर उनके एक जगह टिकने के कारण बहुत मुश्किल हुई कयोंकि अब इन शेयरों के मूल्यों कोई खास उतार चढ़ाव न होने के कारण इन स्टाक्स पर शेयर बाजार के महारथी दलालों ने दांव लगाना ही छोड़ दिया जिससे यह आइडिया भी मजबूत पी ई के बावजूद कोई कमाल न दिखला सका।
दोनों खेमों ने अपने एक्सपर्ट एडवाइजर्स की सलाह पर कुछ चुनिंदा स्टाक्स बाजार कीमत पर खरीदना शुरू किया। इससे इंवेस्टर्स की तो लॉटरी लग गई अपने शेयरों के अच्छे भाव मिलने पर उन्होंने मुनाफा काटना शुरू कर दिया और शेयर बाजार का सेंसेक्स फिर लुढ़क लुढ़क पिछले से भी निचले स्तर पर आ गया।
आप बिल्कुल सही सोच रहें। इसके बाद न तो देवों और न दानवों के पास ही धन बचा कि वे शेयर बाजार में जमे रहते। नारदमुनि की सलाह पर अपनी टी आर पी बढ़ाने का सपना तो टूट ही गया। तो ऐसा है शेयर बाजार का सेंसेक्स कि इसका सही सेक्स किसी को भी पता नहीं चलता। जिसके कारण यह रोज रोज है नीचे गिरता।
और आपका यह सोचना भी अपनी जगह ठीक है कि दोनों पक्ष एक ही रणनीति पर क्यों चल रहे थे तो आपकी जानकारी के लिए यह बतला दूं कि दोनों के पास दिव्य शक्तियां होती हैं जिनसे वे विपक्षी के मन की सही सही जानकारी हासिल कर लेते हैं। पर उनकी ये शक्तियां नारदमुनि पर बेअसर रहती हैं और शेयर बाजार में घुसनेवाला तो विवेकशून्य हो जाता है इसलिए शेयर बाजार की लुटिया के बारे में कुछ सोच ही नहीं पाता है कि शेयर बाजार की लुटिया है, डूबा कर ही जान लेगी।
नारदमुनि की सलाह पर शेयर बाजार के चक्कर में देवराज और दानवासुर दोनों ने ही अपना सारा धन गँवा दिया और साथ ही चकनाचूर हुआ उनका प्रभुत्व कायम करने का सपना। तो जिस शेयर बाजार ने देव और दानवों तक की वॉट लगा दी तो मृत्युलोक निवासी आखिर किस खेत की मूली हैं, वे भी बिल्कुल मामूली हैं।
अब ये मत पुछियेगा कि ये सब मुझे कैसे पता चला... भाई वही रात मे जो सपने आये थे ना.. उन्ही सपनो मे नारद जी ने आके सुनाया.. तभी तो हमने उल्टी गंगा मे चैन की बंसी बजाई।
अब इतनी टेन्शन के बाद नारद जी की कहानी झेलिये...
नारदमुनि का नारदनामा और शेयर बाजार
नारद मुनि अपनी आदत के अनुसार यायावरी में स्वर्ग पहुँच गये। यहां पर नारद जी ने देवराज को दुखी पाया। देवराज इन्द्र को दुखी देख नारदमुनि पहली बार अपना तखल्लुस नारायण नारायण का उच्चारण भूल गए। इसे गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज कराया जा सकता है। प्रणाम देवर्षि, माफी चाहता हूँ पर नारद जी ने अपनी गलती स्वीकार की कि वे नारायण नारायण कहना भूल गए इसलिए उनका ध्यान न खिंच सका। देवों के देव इन्द्र ने बतलाया कि अब मृत्युलोक वासी इंसान उनकी पूजा-अर्चना से विमुख होता जा रहा है जिससे देवताओं का वर्चस्व मृत्युलोक में खतरे में पड़ गया है।
नारद मुनि अपनी त्रिकाल दृष्टि से देखकर बतलाते हैं कि आजकल मृत्युलोक निवासी शेयर बाजार में होने वाले उतार चढाव के कारण भयंकर रूप से परेशान हैं और यह परेशानी शेयर बाजार के न चढ़ने के कारण इतनी अधिक बढ़ गयी है कि वे सांस तक खींचना भूल जाते हैं, फिर भला फिर पूजा-अर्चना भला कैसे याद रह सकती है। इस पर देवराज और चिंता में डूब जाते हैं। इतना डूब जाते हैं कि नारदमुनि उनके सामने साकार हैं, वे यह भी भूल जाते हैं। तब नारद मुनि फिर एक बार नारायण नारायण गुंजायमान करते हैं। और एकाएक झटके से देवेन्द्र चिंता से बाहर आते हैं।
नारदमुनि देवराज को सलाह देते हैं कि "देवराज आप कुबेर को आदेश करें कि वे शेयर बाजार को मंदी के इस भीषण प्रकोप से बचायें, अपना धन शेयर बाजार में झोंक दें और किसी भी तरह से बाजार को मंदी की राह से निकाल कर तेजी की राह पर सरपट दौड़ायें और महाराज कुबेर के इस करतब की कथा मृत्युलोक में इंडिया टीवी, आईबीएन सेवन सरीखे चैनलों के माध्यम से प्रचारित करें, वे चैनल इसी प्रकार की कथाओं के प्रसारण में निपुण हैं और सिद्धता प्राप्त कर चुके हैं जिससे उनकी टी आर पी भी तेजी से बढ़ रही है।
कुबेर कथा में यह बतलाया जाये कि महाराज कुबेर द्वारा मृत्युलोक निवासियों का यह दुख नहीं देखा गया क्योंकि वैसे भी उस लोक के वासियों को तो अंतत: मर ही जाना है तो उनका बार बार मरना असहनीय हो रहा है, जिससे देवताओं के प्रति मृत्युलोक वासियों की आस्था फिर मजबूत होगी और वे फिर से देवताओं की इबादत में मशगूल हो जायेंगे। वैसे भी पृथ्वी पर भारत के सिवाय तो देवताओं की कोई ज्यादा पूछ है नहीं, वहां से भी खत्म हो गई तो फिर देवताओं को अमर होकर भी क्या लाभ मिलेगा इसलिए यह तात्कालिक उपाय किए जाने चाहियें।
वो एक उक्ति है न कि विनाशकाले विपरीत बुद्धि तो नारदमुनि की सलाह ने तुरंत असर किया और देवराज इन्द्र को यह युक्ति पसन्द आयी और उन्होने फौरन कुबेर को आदेश दे दिया।
उधर नारदमुनि नारायण नारायण अलापते हुए पाताल लोक में भी इस बाबत हंगामा मचा कर सलाह दे आये। इससे एक बार फिर स्पष्ट हो गया कि इंडिया टीवी, आई बी एन सेवन सरीखे चैनलों की संकल्पना नारदमुनि के किरदार से प्रेरित होकर पृथ्वीवासियों ने की होगी। इधर नारद जी ने दानवासुर को भी इस गुप्त तथ्य की जानकारी लगे हाथ दे दी कि मृत्युलोक वासियों में देवराज की टी आर पी कम हो रही जिसके मूल में गिरता और तेजी से गिरता शेयर बाजार है और यही वह अवसर है जब रावण के कुकर्मों द्वारा खत्म हुई टी आर पी को दोबारा से गेन करने के सुअवसर का लाभ उठाया जा सकता है तो दानव भी भारतीय शेयर बाजार में कुछ इस तरह कूद पड़े कि कहना पड़ा पांचों घी में और सिर कड़ाही के अंदर।
दानवासुर ने भी सोचा कि यही अच्छा समय है जब अपनी टी आर पी में बढ़ोतरी की जा सकती है और इंसानों के कमजोर से नाजुक दिल पर बाजार को संभाल कर कब्जा किया जा सकता है। एक बार मृत्युलोक निवासी हमारे झांसे में फंस गये तो फिर दानवों को स्वर्ग पर कब्जा करने में कोई अड़चन नहीं आयेगी।
दोनों ही पक्षों के फाइनेंसियल एक्सपर्ट्स अपनी अमरता का लाभ लेते हुए मृत्युलोक पर कूद पड़े क्योंकि अगर वे पारंपिक यातायात सेवा से आते तो देर हो जाती और उतर आयें और उन्होंने शुरू कर दिया अपना शेयर बाजार सुधारो अभियान। जहां तक उन्हें समझ आया उसके अनुसार अमेरिका में चल रही वित्तीय समस्या, क्रुड के रोजाना बढ़ते गिरते भाव, महंगाई का सुपरक्वीन बनते जाना, कम्पनियों का दिवालिया होना, मौसम की मार, करेन्सी मे उठाव-पटक इत्यादि ढेरों कारण हैं, जिससे शेयर बाजार रसातल में समाता जा रहा है।ं
दिव्य शक्तियों से सराबोर दोनों पक्षों ने सोचा कि क्यों न पहले अमेरिका के वित्तीय संकट को पहले हल किया जाये और वे बेचारे पैसों का इन्तजाम करते गये... करते गये... नतीजतन अमेरिका के पास लिक्वेडिटी ज्यादा हो गयी जिससे महंगाई बढ़ने लगी, महंगाई के चढ़ने का सीधा असर वॉल स्ट्रीट पर दीखने लगा जिससे देश दुनिया के शेयर बाजारों में हड़कम्प बच गया .... चारों तरफ त्राहि माम, त्राहि मामा, त्राहि बाप, त्राहि चाचा इत्यादि की चीखें सुनाई पड़ने लगीं जिससे देव-दानव अपने अपने खेमे मे परेशान हो गये... अब क्या होगा ? आखिर यह दांव उनके लिए उल्टा कैसे पड़ गया ...
एक बार फिर मृत्युलोक का सरकारी टूर बनाया गया और एक नई सोची समझी नीति के अनुसार इस बार क्रूड कि कीमतों को स्थिर किया पर इससे भी ज्यादा सकारात्मक असर दिखाई नहीं दिया सिर्फ चंद रिफाईनरीज शेयर्स की दशा ही सुधरी। पर उनके एक जगह टिकने के कारण बहुत मुश्किल हुई कयोंकि अब इन शेयरों के मूल्यों कोई खास उतार चढ़ाव न होने के कारण इन स्टाक्स पर शेयर बाजार के महारथी दलालों ने दांव लगाना ही छोड़ दिया जिससे यह आइडिया भी मजबूत पी ई के बावजूद कोई कमाल न दिखला सका।
दोनों खेमों ने अपने एक्सपर्ट एडवाइजर्स की सलाह पर कुछ चुनिंदा स्टाक्स बाजार कीमत पर खरीदना शुरू किया। इससे इंवेस्टर्स की तो लॉटरी लग गई अपने शेयरों के अच्छे भाव मिलने पर उन्होंने मुनाफा काटना शुरू कर दिया और शेयर बाजार का सेंसेक्स फिर लुढ़क लुढ़क पिछले से भी निचले स्तर पर आ गया।
आप बिल्कुल सही सोच रहें। इसके बाद न तो देवों और न दानवों के पास ही धन बचा कि वे शेयर बाजार में जमे रहते। नारदमुनि की सलाह पर अपनी टी आर पी बढ़ाने का सपना तो टूट ही गया। तो ऐसा है शेयर बाजार का सेंसेक्स कि इसका सही सेक्स किसी को भी पता नहीं चलता। जिसके कारण यह रोज रोज है नीचे गिरता।
और आपका यह सोचना भी अपनी जगह ठीक है कि दोनों पक्ष एक ही रणनीति पर क्यों चल रहे थे तो आपकी जानकारी के लिए यह बतला दूं कि दोनों के पास दिव्य शक्तियां होती हैं जिनसे वे विपक्षी के मन की सही सही जानकारी हासिल कर लेते हैं। पर उनकी ये शक्तियां नारदमुनि पर बेअसर रहती हैं और शेयर बाजार में घुसनेवाला तो विवेकशून्य हो जाता है इसलिए शेयर बाजार की लुटिया के बारे में कुछ सोच ही नहीं पाता है कि शेयर बाजार की लुटिया है, डूबा कर ही जान लेगी।
नारदमुनि की सलाह पर शेयर बाजार के चक्कर में देवराज और दानवासुर दोनों ने ही अपना सारा धन गँवा दिया और साथ ही चकनाचूर हुआ उनका प्रभुत्व कायम करने का सपना। तो जिस शेयर बाजार ने देव और दानवों तक की वॉट लगा दी तो मृत्युलोक निवासी आखिर किस खेत की मूली हैं, वे भी बिल्कुल मामूली हैं।
अब ये मत पुछियेगा कि ये सब मुझे कैसे पता चला... भाई वही रात मे जो सपने आये थे ना.. उन्ही सपनो मे नारद जी ने आके सुनाया.. तभी तो हमने उल्टी गंगा मे चैन की बंसी बजाई।
मंगलवार, 20 जनवरी 2009
कुछ विचार
कभी कभी किसी मोड़ पर रूककर
टटोलती हूँ, अपने आपको
सोचती हूँ
क्या तुम सही थे?
कई बार सोचती हूँ
और जब तुम याद दिलाते हो
कि आज भी तुम हो
तब बेचैनी बढ जाती है
पर सोचो ना
"तुम हो" तुमने यह जताया
पर "मै भी हूँ"
क्या तुम यह जान सके?
"मेरे होने" को तुम
अनदेखा करते रह गये
तुम्हारा होना
इतना हावी हो गया कि
मुझे खुद को बचाने के लिये
तुम्हारी गली छोड़नी पड़ी
"तुम हो" मै जानती हूँ
पर "मै" भी "हूँ"
तुम नही जान पाये
"मै" वही जी पाऊँगी
जहाँ "मेरा होना" भी होगा
यही सोचकर
फिर से चल पड़ी हूँ
पर तुम्हे बताकर जाना चाहती हूँ
कि जब तुम्हे लगे कि
"तुम्हारे" साथ "मेरा" भी होना
तुम्हे परेशान नही करता
आ जाना
फिर इस अनंत गगन मे
"हम" रहेंगे
मै और तुम से अलग
"हम" बनकर
टटोलती हूँ, अपने आपको
सोचती हूँ
क्या तुम सही थे?
कई बार सोचती हूँ
और जब तुम याद दिलाते हो
कि आज भी तुम हो
तब बेचैनी बढ जाती है
पर सोचो ना
"तुम हो" तुमने यह जताया
पर "मै भी हूँ"
क्या तुम यह जान सके?
"मेरे होने" को तुम
अनदेखा करते रह गये
तुम्हारा होना
इतना हावी हो गया कि
मुझे खुद को बचाने के लिये
तुम्हारी गली छोड़नी पड़ी
"तुम हो" मै जानती हूँ
पर "मै" भी "हूँ"
तुम नही जान पाये
"मै" वही जी पाऊँगी
जहाँ "मेरा होना" भी होगा
यही सोचकर
फिर से चल पड़ी हूँ
पर तुम्हे बताकर जाना चाहती हूँ
कि जब तुम्हे लगे कि
"तुम्हारे" साथ "मेरा" भी होना
तुम्हे परेशान नही करता
आ जाना
फिर इस अनंत गगन मे
"हम" रहेंगे
मै और तुम से अलग
"हम" बनकर
बुधवार, 31 दिसंबर 2008
अस्तित्व
मै अपनी छोटी बहन के काफी नजदीक हूँ, घर से लेकर बाहर तक होने वाली सारी समस्यायो को बाँटती रहती है, ये समझिये कि सोने के पहले का मेरा नियम है कि कम से कम १ घण्टे वो मुझे टेप रिकार्डर की तरह पुरा किस्सा सुनाती है, साथ मे वो अपने स्कुल की वाईस कैप्टन भी है तो सारी लड़कियों की समस्यायें भी सुनाती रहती है। उसकी सारी सहेलियाँ भी मुझसे काफी जुड़ी है... (बस अब अपनी तारीफ नहीं)...
मेरा मकसद अपनी तारीफ नही... कुछ कहना है... इन दिनो नारी, चोखेर बाली ब्लाग पर कुछ गहमा-गहमी है... रेगुलर नही देख पा रही पर समझ मे जो आया है कुछ ऐसा है कि... एक बार फिर हमारे अस्तित्व को किसी ने ललकारा है... अब ये गहमा गहमी सिर्फ किसी ब्लॉग विशेष के लिये नही बल्कि हमारे अस्तित्व के लिये है... वो चाहे ब्लॉग हो य सड़क पर चलता हुआ जीवन... चाहे घर की चारदीवारी मे रहता हुआ जीवन... चाहे बन्द मुट्ठी मे मिटता हुआ जीवन...
ऐसे सवाल उठते रहते हैं... कोई अपना आक्रोश प्रकट कर पाता है और कोई अन्दर ही अन्दर जलता रहता है...
मेरे पास जब ऐसे सवाल आते हैं तो मेरा जवाब होता है... दो ही रास्ते हैं... या तो उसे अपनी नियति मान लो.. या फिर इतनी आग पैदा करो कि तुम्हारे अस्तित्व पर किसी भी तरह का सवाल उठाने की कोई हिम्मत भी न रख सके...
ऐसा क्यों कि पुरूष जो चाहे उसका अधिकार है... और हम... हमारी इच्छा उसके अनुसार हो
पुरूष सर्व शक्तिमान और हम उसके कमेंट्स सुनने उसके ज्यादती सहने के मजबूर हो
ये नही होना चाहिये... और इसके लिये जब लड़ो तो वाकई मे लड़ो... फिर भूल जाओ कोई बन्धन... हम सिर्फ एक शरीर हैं?... अगर हाँ तो फिर कोई सवाल ही नही उठता, अगर नहीं... तो फिर हमारे किसी को अंगुली उठाने का कतई हक नही है।
हम सम्पूर्ण अस्तित्व हैं... और हमे इसे साबित करने की जरूरत नही है... तुम जानते हो... और इसलिये अपने अस्तित्व को बचाने के लिये हमारे ऊपर समाज, रिश्तेदार, सभ्यता इत्यादि दोहरे मापदंडो की सीमा डाल दी है। पर हम लड़ेंगे अपने अस्तित्व के लिये अपने हक के लिये, सामने चाहे जो कोई भी आये... वो कोई भी हो... हम लड़ेंगे...
फिर हम किसी सभ्यता समाज नियम कानुन की परवाह नही करेंगे... अपने हक के लिये अर्जून ने अपने रिश्तेदारो के प्रति गाण्डीव उठाया तो वो धर्म कहलाया.. तो हमारा कदम अधर्म कैसे हो गया?
आगे की बात.. सिर्फ लड़ेंगे कहने से बात नही बनने वाली... मै यही कहती हूँ.. लड़ो... बिना किसी झिझक के लड़ो... बिना किसी डर के लड़ो... जब जंग अपने अस्तित्व को स्थापित करने के लिये हो तो फिर तुम्हारे कदम नही रूकने चाहिये... किसी भी परिस्थिती मे नहीं... कैसा डर... बात शरीर की नही... बात सिर्फ आत्मा की भी नही.. बात है इनके मेल से बने अस्तित्व की... जिसके लिये हम जी रहे हैं. जिसके कारण हम है... फिर उसपर जब कोई सवाल उठता है तो लड़ने मे डर कैसा.... अगर आज हम नही लड़े तो हमारी आने वाली पीढीयाँ इसी आक्रोश की शिकार होंगी... मै नही चाहती कि मेरी आने वाली पीढी़ को सिर्फ इसलिये चुप रहना पड़े क्योंकि वो बेटी है... मै लड़ूँगी अपने अस्तित्व के लिये... और उस आगंतुक अस्तित्व के लिये... हमारे अस्तित्व के लिये... जिसको जो समझना है समझे...
मेरा मकसद अपनी तारीफ नही... कुछ कहना है... इन दिनो नारी, चोखेर बाली ब्लाग पर कुछ गहमा-गहमी है... रेगुलर नही देख पा रही पर समझ मे जो आया है कुछ ऐसा है कि... एक बार फिर हमारे अस्तित्व को किसी ने ललकारा है... अब ये गहमा गहमी सिर्फ किसी ब्लॉग विशेष के लिये नही बल्कि हमारे अस्तित्व के लिये है... वो चाहे ब्लॉग हो य सड़क पर चलता हुआ जीवन... चाहे घर की चारदीवारी मे रहता हुआ जीवन... चाहे बन्द मुट्ठी मे मिटता हुआ जीवन...
ऐसे सवाल उठते रहते हैं... कोई अपना आक्रोश प्रकट कर पाता है और कोई अन्दर ही अन्दर जलता रहता है...
मेरे पास जब ऐसे सवाल आते हैं तो मेरा जवाब होता है... दो ही रास्ते हैं... या तो उसे अपनी नियति मान लो.. या फिर इतनी आग पैदा करो कि तुम्हारे अस्तित्व पर किसी भी तरह का सवाल उठाने की कोई हिम्मत भी न रख सके...
ऐसा क्यों कि पुरूष जो चाहे उसका अधिकार है... और हम... हमारी इच्छा उसके अनुसार हो
पुरूष सर्व शक्तिमान और हम उसके कमेंट्स सुनने उसके ज्यादती सहने के मजबूर हो
ये नही होना चाहिये... और इसके लिये जब लड़ो तो वाकई मे लड़ो... फिर भूल जाओ कोई बन्धन... हम सिर्फ एक शरीर हैं?... अगर हाँ तो फिर कोई सवाल ही नही उठता, अगर नहीं... तो फिर हमारे किसी को अंगुली उठाने का कतई हक नही है।
हम सम्पूर्ण अस्तित्व हैं... और हमे इसे साबित करने की जरूरत नही है... तुम जानते हो... और इसलिये अपने अस्तित्व को बचाने के लिये हमारे ऊपर समाज, रिश्तेदार, सभ्यता इत्यादि दोहरे मापदंडो की सीमा डाल दी है। पर हम लड़ेंगे अपने अस्तित्व के लिये अपने हक के लिये, सामने चाहे जो कोई भी आये... वो कोई भी हो... हम लड़ेंगे...
फिर हम किसी सभ्यता समाज नियम कानुन की परवाह नही करेंगे... अपने हक के लिये अर्जून ने अपने रिश्तेदारो के प्रति गाण्डीव उठाया तो वो धर्म कहलाया.. तो हमारा कदम अधर्म कैसे हो गया?
आगे की बात.. सिर्फ लड़ेंगे कहने से बात नही बनने वाली... मै यही कहती हूँ.. लड़ो... बिना किसी झिझक के लड़ो... बिना किसी डर के लड़ो... जब जंग अपने अस्तित्व को स्थापित करने के लिये हो तो फिर तुम्हारे कदम नही रूकने चाहिये... किसी भी परिस्थिती मे नहीं... कैसा डर... बात शरीर की नही... बात सिर्फ आत्मा की भी नही.. बात है इनके मेल से बने अस्तित्व की... जिसके लिये हम जी रहे हैं. जिसके कारण हम है... फिर उसपर जब कोई सवाल उठता है तो लड़ने मे डर कैसा.... अगर आज हम नही लड़े तो हमारी आने वाली पीढीयाँ इसी आक्रोश की शिकार होंगी... मै नही चाहती कि मेरी आने वाली पीढी़ को सिर्फ इसलिये चुप रहना पड़े क्योंकि वो बेटी है... मै लड़ूँगी अपने अस्तित्व के लिये... और उस आगंतुक अस्तित्व के लिये... हमारे अस्तित्व के लिये... जिसको जो समझना है समझे...
शनिवार, 18 अक्टूबर 2008
करवा चौथ पर मेरे विचार
कल रात करवाचौथ पर बहुतों ने अपने विचार दिये, मेरे विचार जानने हेतु क्लिक कीजिए। नामक पोस्ट जीवन ऊर्जा पर पोस्ट हो गयी थी... उसे चिकित्सा सम्बन्धी ही बनाये रखन है इसलिये उसे यहाँ ट्रान्सफर कर रही हूँ।
शुक्रिया :)
सत्यवती जी मेरे विचार को पसन्द करने के लिये शुक्रिया :)
शुक्रिया :)
सत्यवती जी मेरे विचार को पसन्द करने के लिये शुक्रिया :)
बुधवार, 10 सितंबर 2008
लौट आओ
लौट आओ कि अंधरी ये रात हुई
अब तक खफ़ा हो, ये क्या बात हुई
चुपके से किसी तन्हा सी घड़ी में
याद आती है, थी जो मुलाकात हुई
सालती है दर्द-ए-दिल को ये खा़मोशी
आवाज दो कि अब ये ज़र्द रात हुई
कहो कैसे जिये" गरिमा" तुम्हारे बिना
तुम बिन अन्धेरी ये कायनात हुई
नहीं लौट सकते तो मत आओ
इतना बता दो इस बेरुखी की क्या बात हुई
अब तक खफ़ा हो, ये क्या बात हुई
चुपके से किसी तन्हा सी घड़ी में
याद आती है, थी जो मुलाकात हुई
सालती है दर्द-ए-दिल को ये खा़मोशी
आवाज दो कि अब ये ज़र्द रात हुई
कहो कैसे जिये" गरिमा" तुम्हारे बिना
तुम बिन अन्धेरी ये कायनात हुई
नहीं लौट सकते तो मत आओ
इतना बता दो इस बेरुखी की क्या बात हुई
मंगलवार, 26 अगस्त 2008
सुबह की सैर और दिव्य अनुभुति
सुबह-सुबह वॉक पर निकली इस बात को नजर अन्दाज करते हुई कि, की बाहर बारिश हो रही है। वैसे बारिश की आवाज मानो संगीत.. कानो मे अमृत घोल रही थी, और मै जान-बूझकर घर मे किसी को जगाये बिना निकल पडी, एक तो अभी ही एलर्जी ठीक हुई ( अगर घर में किसी को पता चल गया) तो कोई जाने नही देगा। बाहर रास्ते पर कोई भी नही दिख रहा था, पर मुझे तो जैसे बारिश की धार आकृष्ट कर रही थीं, रास्ता अकेला हो तो अमूमन मै आसपास ही चहलकदमी कर लेती हूँ, पर उमडती-घुमडती घटाओं के साथ, सीमा याद नही रख सकी और निकल पडी उन गलियों मे जिधर अक्सर चिड़ियों को देखने उनके कलरव के आनन्द मे डूबने के लिये निकल पडती हूँ, और कारण भी यही है कि मुझे सुबह आकर्षित करती है। वरना गहरी नींद मे सोने से बेहतर वॉक पर जाना... ऐसा जैसे कि चॉकलेट से बेहतर गुड समझना... ।
बारिश धीमी नही थी, तेज भी नही थी, आनंदमग्न होने के लिये बढिया थी... भीगते वक्त याद आने लगी कुछ पुरानी बातें, उन दिनो मे सुबह बारिश हो जाये तो मुसीबत आ जाती, स्कूल कैसे जायें? भीगने का डर नही होता, बल्कि घुटने तक कीचड़ साईकिल के पहियो का जमने का डर सालता.. और इसी डर के साथ निकल जाते.. स्कूल पहूँचते पहूँचते तो चिडियाघर से भागे बन्दर तो दिखती ही मै( ऐसे भी कोई अच्छी नही दिखती) अब वापसी मे प्रार्थना की जाती की हे भगवान बारिश ना थमे... इसका फायदा होगा कि साईकिल को अलग से धोना नही पडेगा... आप से आप धुल जायेगी (बचपन की आलसी जो ठहरी) वैसे उधर कोटा की अपेक्षा ज्यादा बारिश होती है, और गाँव मे तो पक्की सड़कें भी नही हैं, कच्ची सडको पर कीचड लगना आम बात है... यही नहीं.. कपडे धुल जायें तो सूखेंगे कैसे? वाशिंग-मशीन भी तो नहीं है, और होता भी तो बिजली के बिना; बिना सर पैर का सिपाही होता... खैर
... और याद आने लगा कि कैसे मम्मी कुछ सूखी-भीगे लकड़ियों से चुल्हा जलाने की कोशिश करती रहती... और दादा जी परेशान होते मम्मी की परेशानी देखकर... पर वो भी क्या करते? बारिश मे सब कुछ भीग ही जाता... और मेरी गाय.. जिसका बहुत प्यार से मैने नाम रखा था सुमन.. एक ही खूँटे पर बँधी-बँधी परेशान हो जाती, उसे एक जगह पर स्थित होना अच्छा नही लगता था... बहुत सीधी सी थी वो.. पर बारिश मे वो बहत परेशान होती... दूसरे खूँटे तक आने के लिये रँभाती रहती... पर हम भी बेबस थे...और एक बारिश मे उसने जाने कैसे.. रस्सी तोड ली... भागी बाहर... बाहर गिर पडी फिर फिर कभी ना उठी.... उसके बाद दूसरी गाय आयी... पर सुमन की जगह कोई नही ले सका.. सुमन की याद आते ही पिछली यादो से रिश्ता टूट गया.. वैसे जुड़ना चाहिये था.. पर टूट गया, कारण कि मेरे सामने वैसी ही एक धवल गाय रंभाते खडी थी... मै सोच रही थी कि काश ये मेरी सुमन होती... मै थोडी देर खडी रहे... मेरे सुमन होती तो दौडकर आती और मुझे चाटना शुरू करती.. यथार्थ कल्पना पर हावी हो गया... तब समझ मे आया कि मै ज्यादा भीग ली लौटना चाहिये..
पर दुख: मूल नही होता... और मन स्थिर नही होता... मन चल पडा... नये अनुभव की तरफ शायद कुछ ज्यादा ही भीग ली, अन्तःकरण से अपने ही अहसासों मे काफी बदलाव महसूस कर रही थी, बारिश मे धुल रहे पेड पौधे मुझे बहुत प्यारे लगते हैं, और आज तो जैसे हर डाली मुझे अपनी सी लग रही थी... इनके साथ जैसे अपने अन्दर भी कुछ अलग अनुभव हो रहा था... अपनी ही धडकनो को सुन रही थी... आनंद के सरोवर मे जैसे हिलोरे लेने लगी (हाँ असली नदी में तो नही उतरती तैरना नही आता :P)... और साथ मे मेरे डालियों पर झूमती पत्तियाँ, बहती धार की रूनझून, त्वचा को छूकर निकलती बूंदे पलको पर ठहरती बूंदे , एक जगह टिक कर इन सबके आनन्द मे मग्न, तभी नजर पडी, उस पेड पर जहाँ तोतें बारिश मे एक डाली से दूसरे पर चहलकदमी कर रहे थे|
तभी अचानक फिर से यथार्थ मे लौटी, अरे मैं यहाँ कैसे आ गयी.. मै तो लौट रही थी.. आसपास ध्यान दिया तो ध्यान मे आया कि इसी गली मे मोर मोरनी भी दिख जाते हैं, मोर याद आते ही, पंख फैलाये मोर की छवि भी आँखो के सामने तिर आयी... और ज्यादा नही ढूँढना पडा, युगल दिख ही गये, नाचता मोर, मोर के साथ मोरनी, मोर एक ही था, और साथ ४ मोरनी, और देखते ही देखते, विचार कहाँ से कहाँ परिवर्तित हुए, एक मोर जैसे कृष्णा की तरह बीच मे बंसी थामे, और इर्द-गिर्द गोपियाँ राधा संग नृत्य कर रही हों, फिर विचार पलटे, अरे ये क्या ये तो मोर है, कृष्णा थोडी ना है, फिर कान्हा तो बंसी बजाते थे, नाचने का काम गोपियों का था, ये मोर तो नाच रहा है.. फिर ध्यान आया कि कल तो कान्हा का जन्मदिन था, जन्माष्टमी, गाँव पर होती तो दादी डाँट-डपटकर व्रत करने के लिये तैयार करवा हीं देती मुझको, लेकिन अभी कितना अच्छा है, मैने तो जन्मदिन पर मिठाई खाई... आखिर किसी को तो अच्छे से सेलिब्रेट करना चाहिये, और मन ही मन सोच मुस्कुरा उठी.. फिर लगा कि.. अरे ये सही था कि गलत वो तो कान्हा ही बता सकते है... और फिर तलाश हुई कान्हा कि कान्हा ओ कान्हा...
मोर मुकुट पीताम्बर धारी
तुम तो हो घट-घट मे व्यापी
मेरी अखियाँ दरस को प्यासी
कहाँ मिलोगे हे गिरधारी
ना मै मीरा, ना मै राधा
ना मै जोगन, ना मै दासी
जानू ना मै प्रीत भी साची
ना ही मुझको भक्ति ही आती
गरज बरस के बरसे बदरीया
इत-उत ढूँढू तोके साँवरिया
सोचूँ और फिर खुद पर हँस लूँ
बन के झूमूं मै तो बावरियाँ
ये नही गोकुल, ना ही वृन्दावन
कहां मिलोगे, ओ मेरे मनमोहन
ना मै मीरा, ना मै राधा
क्या दोगे फिर भी तुम दरसन
क्या दोगे मुझको भी दरसन
शायद और कुछ भी सोचा हो... (गाया नही..) खाली पीली मे लोगो की अच्छी नींद उड जाती... हाँ पर रास्ते पर गुनगुनाने का पहला अवसर था... शायद बारिश की बूँदो और कान्हा की तलाश ने शराफत (लाज) का वो पर्दा उडा दिया... होश मे जाने कब आयी... याद नही आ रहा है... घर आने के बाद भी वो मस्ती रही... दैनिक काम मे ... आदतन लगी रही.. लेकिन वाकई जो मस्ती वही रही, वो जा नही रही थी... लेकिन वक्त बहुत रहम है... धीरे धीरे वो अहसास ऐसी याद मे परिवर्तित होता जा रहा है, जिसे याद तो किया जा सकता है, पर ना जिसकी अभिव्यक्ति संभव हो पा रही है...ना जिसका अनुभव हो पा रहा है... कुछ बेचैनी सी छायी है... आलम यह है कि खुद को नही समझ मे आ रहा है कि क्या चाहिये... कुछ भी समझ मे नही आ रहा है... बार बार याद कर रही हूँ, बरसता मौसम, बारिश की छम-छम, मोर का नाच, तोतों की चहलकदमी, धुली पत्तियाँ... पर वो सब कुछ ऐसा ही है कि मानो फिल्म चल रही है, पर मौसम की बहार से मन अछूता है... काश ऐसी सुबह फिर से आये.. और उस दशा को मै फिर से प्राप्त होऊँ :)
बारिश धीमी नही थी, तेज भी नही थी, आनंदमग्न होने के लिये बढिया थी... भीगते वक्त याद आने लगी कुछ पुरानी बातें, उन दिनो मे सुबह बारिश हो जाये तो मुसीबत आ जाती, स्कूल कैसे जायें? भीगने का डर नही होता, बल्कि घुटने तक कीचड़ साईकिल के पहियो का जमने का डर सालता.. और इसी डर के साथ निकल जाते.. स्कूल पहूँचते पहूँचते तो चिडियाघर से भागे बन्दर तो दिखती ही मै( ऐसे भी कोई अच्छी नही दिखती) अब वापसी मे प्रार्थना की जाती की हे भगवान बारिश ना थमे... इसका फायदा होगा कि साईकिल को अलग से धोना नही पडेगा... आप से आप धुल जायेगी (बचपन की आलसी जो ठहरी) वैसे उधर कोटा की अपेक्षा ज्यादा बारिश होती है, और गाँव मे तो पक्की सड़कें भी नही हैं, कच्ची सडको पर कीचड लगना आम बात है... यही नहीं.. कपडे धुल जायें तो सूखेंगे कैसे? वाशिंग-मशीन भी तो नहीं है, और होता भी तो बिजली के बिना; बिना सर पैर का सिपाही होता... खैर
... और याद आने लगा कि कैसे मम्मी कुछ सूखी-भीगे लकड़ियों से चुल्हा जलाने की कोशिश करती रहती... और दादा जी परेशान होते मम्मी की परेशानी देखकर... पर वो भी क्या करते? बारिश मे सब कुछ भीग ही जाता... और मेरी गाय.. जिसका बहुत प्यार से मैने नाम रखा था सुमन.. एक ही खूँटे पर बँधी-बँधी परेशान हो जाती, उसे एक जगह पर स्थित होना अच्छा नही लगता था... बहुत सीधी सी थी वो.. पर बारिश मे वो बहत परेशान होती... दूसरे खूँटे तक आने के लिये रँभाती रहती... पर हम भी बेबस थे...और एक बारिश मे उसने जाने कैसे.. रस्सी तोड ली... भागी बाहर... बाहर गिर पडी फिर फिर कभी ना उठी.... उसके बाद दूसरी गाय आयी... पर सुमन की जगह कोई नही ले सका.. सुमन की याद आते ही पिछली यादो से रिश्ता टूट गया.. वैसे जुड़ना चाहिये था.. पर टूट गया, कारण कि मेरे सामने वैसी ही एक धवल गाय रंभाते खडी थी... मै सोच रही थी कि काश ये मेरी सुमन होती... मै थोडी देर खडी रहे... मेरे सुमन होती तो दौडकर आती और मुझे चाटना शुरू करती.. यथार्थ कल्पना पर हावी हो गया... तब समझ मे आया कि मै ज्यादा भीग ली लौटना चाहिये..
पर दुख: मूल नही होता... और मन स्थिर नही होता... मन चल पडा... नये अनुभव की तरफ शायद कुछ ज्यादा ही भीग ली, अन्तःकरण से अपने ही अहसासों मे काफी बदलाव महसूस कर रही थी, बारिश मे धुल रहे पेड पौधे मुझे बहुत प्यारे लगते हैं, और आज तो जैसे हर डाली मुझे अपनी सी लग रही थी... इनके साथ जैसे अपने अन्दर भी कुछ अलग अनुभव हो रहा था... अपनी ही धडकनो को सुन रही थी... आनंद के सरोवर मे जैसे हिलोरे लेने लगी (हाँ असली नदी में तो नही उतरती तैरना नही आता :P)... और साथ मे मेरे डालियों पर झूमती पत्तियाँ, बहती धार की रूनझून, त्वचा को छूकर निकलती बूंदे पलको पर ठहरती बूंदे , एक जगह टिक कर इन सबके आनन्द मे मग्न, तभी नजर पडी, उस पेड पर जहाँ तोतें बारिश मे एक डाली से दूसरे पर चहलकदमी कर रहे थे|
तभी अचानक फिर से यथार्थ मे लौटी, अरे मैं यहाँ कैसे आ गयी.. मै तो लौट रही थी.. आसपास ध्यान दिया तो ध्यान मे आया कि इसी गली मे मोर मोरनी भी दिख जाते हैं, मोर याद आते ही, पंख फैलाये मोर की छवि भी आँखो के सामने तिर आयी... और ज्यादा नही ढूँढना पडा, युगल दिख ही गये, नाचता मोर, मोर के साथ मोरनी, मोर एक ही था, और साथ ४ मोरनी, और देखते ही देखते, विचार कहाँ से कहाँ परिवर्तित हुए, एक मोर जैसे कृष्णा की तरह बीच मे बंसी थामे, और इर्द-गिर्द गोपियाँ राधा संग नृत्य कर रही हों, फिर विचार पलटे, अरे ये क्या ये तो मोर है, कृष्णा थोडी ना है, फिर कान्हा तो बंसी बजाते थे, नाचने का काम गोपियों का था, ये मोर तो नाच रहा है.. फिर ध्यान आया कि कल तो कान्हा का जन्मदिन था, जन्माष्टमी, गाँव पर होती तो दादी डाँट-डपटकर व्रत करने के लिये तैयार करवा हीं देती मुझको, लेकिन अभी कितना अच्छा है, मैने तो जन्मदिन पर मिठाई खाई... आखिर किसी को तो अच्छे से सेलिब्रेट करना चाहिये, और मन ही मन सोच मुस्कुरा उठी.. फिर लगा कि.. अरे ये सही था कि गलत वो तो कान्हा ही बता सकते है... और फिर तलाश हुई कान्हा कि कान्हा ओ कान्हा...
मोर मुकुट पीताम्बर धारी
तुम तो हो घट-घट मे व्यापी
मेरी अखियाँ दरस को प्यासी
कहाँ मिलोगे हे गिरधारी
ना मै मीरा, ना मै राधा
ना मै जोगन, ना मै दासी
जानू ना मै प्रीत भी साची
ना ही मुझको भक्ति ही आती
गरज बरस के बरसे बदरीया
इत-उत ढूँढू तोके साँवरिया
सोचूँ और फिर खुद पर हँस लूँ
बन के झूमूं मै तो बावरियाँ
ये नही गोकुल, ना ही वृन्दावन
कहां मिलोगे, ओ मेरे मनमोहन
ना मै मीरा, ना मै राधा
क्या दोगे फिर भी तुम दरसन
क्या दोगे मुझको भी दरसन
शायद और कुछ भी सोचा हो... (गाया नही..) खाली पीली मे लोगो की अच्छी नींद उड जाती... हाँ पर रास्ते पर गुनगुनाने का पहला अवसर था... शायद बारिश की बूँदो और कान्हा की तलाश ने शराफत (लाज) का वो पर्दा उडा दिया... होश मे जाने कब आयी... याद नही आ रहा है... घर आने के बाद भी वो मस्ती रही... दैनिक काम मे ... आदतन लगी रही.. लेकिन वाकई जो मस्ती वही रही, वो जा नही रही थी... लेकिन वक्त बहुत रहम है... धीरे धीरे वो अहसास ऐसी याद मे परिवर्तित होता जा रहा है, जिसे याद तो किया जा सकता है, पर ना जिसकी अभिव्यक्ति संभव हो पा रही है...ना जिसका अनुभव हो पा रहा है... कुछ बेचैनी सी छायी है... आलम यह है कि खुद को नही समझ मे आ रहा है कि क्या चाहिये... कुछ भी समझ मे नही आ रहा है... बार बार याद कर रही हूँ, बरसता मौसम, बारिश की छम-छम, मोर का नाच, तोतों की चहलकदमी, धुली पत्तियाँ... पर वो सब कुछ ऐसा ही है कि मानो फिल्म चल रही है, पर मौसम की बहार से मन अछूता है... काश ऐसी सुबह फिर से आये.. और उस दशा को मै फिर से प्राप्त होऊँ :)
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