कल रात करवाचौथ पर बहुतों ने अपने विचार दिये, मेरे विचार जानने हेतु क्लिक कीजिए। नामक पोस्ट जीवन ऊर्जा पर पोस्ट हो गयी थी... उसे चिकित्सा सम्बन्धी ही बनाये रखन है इसलिये उसे यहाँ ट्रान्सफर कर रही हूँ।
शुक्रिया :)
सत्यवती जी मेरे विचार को पसन्द करने के लिये शुक्रिया :)
खुला आकाश, महकता पवन, खिलखिलाता मौसम... और अचानक कही दर्द, रूठता मौसम, सिमटता जीवन, ये सभी रूप जीवन के ही रूप है, एक दुसरे से अलग पर एक दुसरे के बिना अधूरे
शनिवार, 18 अक्टूबर 2008
बुधवार, 10 सितंबर 2008
लौट आओ
लौट आओ कि अंधरी ये रात हुई
अब तक खफ़ा हो, ये क्या बात हुई
चुपके से किसी तन्हा सी घड़ी में
याद आती है, थी जो मुलाकात हुई
सालती है दर्द-ए-दिल को ये खा़मोशी
आवाज दो कि अब ये ज़र्द रात हुई
कहो कैसे जिये" गरिमा" तुम्हारे बिना
तुम बिन अन्धेरी ये कायनात हुई
नहीं लौट सकते तो मत आओ
इतना बता दो इस बेरुखी की क्या बात हुई
अब तक खफ़ा हो, ये क्या बात हुई
चुपके से किसी तन्हा सी घड़ी में
याद आती है, थी जो मुलाकात हुई
सालती है दर्द-ए-दिल को ये खा़मोशी
आवाज दो कि अब ये ज़र्द रात हुई
कहो कैसे जिये" गरिमा" तुम्हारे बिना
तुम बिन अन्धेरी ये कायनात हुई
नहीं लौट सकते तो मत आओ
इतना बता दो इस बेरुखी की क्या बात हुई
मंगलवार, 26 अगस्त 2008
सुबह की सैर और दिव्य अनुभुति
सुबह-सुबह वॉक पर निकली इस बात को नजर अन्दाज करते हुई कि, की बाहर बारिश हो रही है। वैसे बारिश की आवाज मानो संगीत.. कानो मे अमृत घोल रही थी, और मै जान-बूझकर घर मे किसी को जगाये बिना निकल पडी, एक तो अभी ही एलर्जी ठीक हुई ( अगर घर में किसी को पता चल गया) तो कोई जाने नही देगा। बाहर रास्ते पर कोई भी नही दिख रहा था, पर मुझे तो जैसे बारिश की धार आकृष्ट कर रही थीं, रास्ता अकेला हो तो अमूमन मै आसपास ही चहलकदमी कर लेती हूँ, पर उमडती-घुमडती घटाओं के साथ, सीमा याद नही रख सकी और निकल पडी उन गलियों मे जिधर अक्सर चिड़ियों को देखने उनके कलरव के आनन्द मे डूबने के लिये निकल पडती हूँ, और कारण भी यही है कि मुझे सुबह आकर्षित करती है। वरना गहरी नींद मे सोने से बेहतर वॉक पर जाना... ऐसा जैसे कि चॉकलेट से बेहतर गुड समझना... ।
बारिश धीमी नही थी, तेज भी नही थी, आनंदमग्न होने के लिये बढिया थी... भीगते वक्त याद आने लगी कुछ पुरानी बातें, उन दिनो मे सुबह बारिश हो जाये तो मुसीबत आ जाती, स्कूल कैसे जायें? भीगने का डर नही होता, बल्कि घुटने तक कीचड़ साईकिल के पहियो का जमने का डर सालता.. और इसी डर के साथ निकल जाते.. स्कूल पहूँचते पहूँचते तो चिडियाघर से भागे बन्दर तो दिखती ही मै( ऐसे भी कोई अच्छी नही दिखती) अब वापसी मे प्रार्थना की जाती की हे भगवान बारिश ना थमे... इसका फायदा होगा कि साईकिल को अलग से धोना नही पडेगा... आप से आप धुल जायेगी (बचपन की आलसी जो ठहरी) वैसे उधर कोटा की अपेक्षा ज्यादा बारिश होती है, और गाँव मे तो पक्की सड़कें भी नही हैं, कच्ची सडको पर कीचड लगना आम बात है... यही नहीं.. कपडे धुल जायें तो सूखेंगे कैसे? वाशिंग-मशीन भी तो नहीं है, और होता भी तो बिजली के बिना; बिना सर पैर का सिपाही होता... खैर
... और याद आने लगा कि कैसे मम्मी कुछ सूखी-भीगे लकड़ियों से चुल्हा जलाने की कोशिश करती रहती... और दादा जी परेशान होते मम्मी की परेशानी देखकर... पर वो भी क्या करते? बारिश मे सब कुछ भीग ही जाता... और मेरी गाय.. जिसका बहुत प्यार से मैने नाम रखा था सुमन.. एक ही खूँटे पर बँधी-बँधी परेशान हो जाती, उसे एक जगह पर स्थित होना अच्छा नही लगता था... बहुत सीधी सी थी वो.. पर बारिश मे वो बहत परेशान होती... दूसरे खूँटे तक आने के लिये रँभाती रहती... पर हम भी बेबस थे...और एक बारिश मे उसने जाने कैसे.. रस्सी तोड ली... भागी बाहर... बाहर गिर पडी फिर फिर कभी ना उठी.... उसके बाद दूसरी गाय आयी... पर सुमन की जगह कोई नही ले सका.. सुमन की याद आते ही पिछली यादो से रिश्ता टूट गया.. वैसे जुड़ना चाहिये था.. पर टूट गया, कारण कि मेरे सामने वैसी ही एक धवल गाय रंभाते खडी थी... मै सोच रही थी कि काश ये मेरी सुमन होती... मै थोडी देर खडी रहे... मेरे सुमन होती तो दौडकर आती और मुझे चाटना शुरू करती.. यथार्थ कल्पना पर हावी हो गया... तब समझ मे आया कि मै ज्यादा भीग ली लौटना चाहिये..
पर दुख: मूल नही होता... और मन स्थिर नही होता... मन चल पडा... नये अनुभव की तरफ शायद कुछ ज्यादा ही भीग ली, अन्तःकरण से अपने ही अहसासों मे काफी बदलाव महसूस कर रही थी, बारिश मे धुल रहे पेड पौधे मुझे बहुत प्यारे लगते हैं, और आज तो जैसे हर डाली मुझे अपनी सी लग रही थी... इनके साथ जैसे अपने अन्दर भी कुछ अलग अनुभव हो रहा था... अपनी ही धडकनो को सुन रही थी... आनंद के सरोवर मे जैसे हिलोरे लेने लगी (हाँ असली नदी में तो नही उतरती तैरना नही आता :P)... और साथ मे मेरे डालियों पर झूमती पत्तियाँ, बहती धार की रूनझून, त्वचा को छूकर निकलती बूंदे पलको पर ठहरती बूंदे , एक जगह टिक कर इन सबके आनन्द मे मग्न, तभी नजर पडी, उस पेड पर जहाँ तोतें बारिश मे एक डाली से दूसरे पर चहलकदमी कर रहे थे|
तभी अचानक फिर से यथार्थ मे लौटी, अरे मैं यहाँ कैसे आ गयी.. मै तो लौट रही थी.. आसपास ध्यान दिया तो ध्यान मे आया कि इसी गली मे मोर मोरनी भी दिख जाते हैं, मोर याद आते ही, पंख फैलाये मोर की छवि भी आँखो के सामने तिर आयी... और ज्यादा नही ढूँढना पडा, युगल दिख ही गये, नाचता मोर, मोर के साथ मोरनी, मोर एक ही था, और साथ ४ मोरनी, और देखते ही देखते, विचार कहाँ से कहाँ परिवर्तित हुए, एक मोर जैसे कृष्णा की तरह बीच मे बंसी थामे, और इर्द-गिर्द गोपियाँ राधा संग नृत्य कर रही हों, फिर विचार पलटे, अरे ये क्या ये तो मोर है, कृष्णा थोडी ना है, फिर कान्हा तो बंसी बजाते थे, नाचने का काम गोपियों का था, ये मोर तो नाच रहा है.. फिर ध्यान आया कि कल तो कान्हा का जन्मदिन था, जन्माष्टमी, गाँव पर होती तो दादी डाँट-डपटकर व्रत करने के लिये तैयार करवा हीं देती मुझको, लेकिन अभी कितना अच्छा है, मैने तो जन्मदिन पर मिठाई खाई... आखिर किसी को तो अच्छे से सेलिब्रेट करना चाहिये, और मन ही मन सोच मुस्कुरा उठी.. फिर लगा कि.. अरे ये सही था कि गलत वो तो कान्हा ही बता सकते है... और फिर तलाश हुई कान्हा कि कान्हा ओ कान्हा...
मोर मुकुट पीताम्बर धारी
तुम तो हो घट-घट मे व्यापी
मेरी अखियाँ दरस को प्यासी
कहाँ मिलोगे हे गिरधारी
ना मै मीरा, ना मै राधा
ना मै जोगन, ना मै दासी
जानू ना मै प्रीत भी साची
ना ही मुझको भक्ति ही आती
गरज बरस के बरसे बदरीया
इत-उत ढूँढू तोके साँवरिया
सोचूँ और फिर खुद पर हँस लूँ
बन के झूमूं मै तो बावरियाँ
ये नही गोकुल, ना ही वृन्दावन
कहां मिलोगे, ओ मेरे मनमोहन
ना मै मीरा, ना मै राधा
क्या दोगे फिर भी तुम दरसन
क्या दोगे मुझको भी दरसन
शायद और कुछ भी सोचा हो... (गाया नही..) खाली पीली मे लोगो की अच्छी नींद उड जाती... हाँ पर रास्ते पर गुनगुनाने का पहला अवसर था... शायद बारिश की बूँदो और कान्हा की तलाश ने शराफत (लाज) का वो पर्दा उडा दिया... होश मे जाने कब आयी... याद नही आ रहा है... घर आने के बाद भी वो मस्ती रही... दैनिक काम मे ... आदतन लगी रही.. लेकिन वाकई जो मस्ती वही रही, वो जा नही रही थी... लेकिन वक्त बहुत रहम है... धीरे धीरे वो अहसास ऐसी याद मे परिवर्तित होता जा रहा है, जिसे याद तो किया जा सकता है, पर ना जिसकी अभिव्यक्ति संभव हो पा रही है...ना जिसका अनुभव हो पा रहा है... कुछ बेचैनी सी छायी है... आलम यह है कि खुद को नही समझ मे आ रहा है कि क्या चाहिये... कुछ भी समझ मे नही आ रहा है... बार बार याद कर रही हूँ, बरसता मौसम, बारिश की छम-छम, मोर का नाच, तोतों की चहलकदमी, धुली पत्तियाँ... पर वो सब कुछ ऐसा ही है कि मानो फिल्म चल रही है, पर मौसम की बहार से मन अछूता है... काश ऐसी सुबह फिर से आये.. और उस दशा को मै फिर से प्राप्त होऊँ :)
बारिश धीमी नही थी, तेज भी नही थी, आनंदमग्न होने के लिये बढिया थी... भीगते वक्त याद आने लगी कुछ पुरानी बातें, उन दिनो मे सुबह बारिश हो जाये तो मुसीबत आ जाती, स्कूल कैसे जायें? भीगने का डर नही होता, बल्कि घुटने तक कीचड़ साईकिल के पहियो का जमने का डर सालता.. और इसी डर के साथ निकल जाते.. स्कूल पहूँचते पहूँचते तो चिडियाघर से भागे बन्दर तो दिखती ही मै( ऐसे भी कोई अच्छी नही दिखती) अब वापसी मे प्रार्थना की जाती की हे भगवान बारिश ना थमे... इसका फायदा होगा कि साईकिल को अलग से धोना नही पडेगा... आप से आप धुल जायेगी (बचपन की आलसी जो ठहरी) वैसे उधर कोटा की अपेक्षा ज्यादा बारिश होती है, और गाँव मे तो पक्की सड़कें भी नही हैं, कच्ची सडको पर कीचड लगना आम बात है... यही नहीं.. कपडे धुल जायें तो सूखेंगे कैसे? वाशिंग-मशीन भी तो नहीं है, और होता भी तो बिजली के बिना; बिना सर पैर का सिपाही होता... खैर
... और याद आने लगा कि कैसे मम्मी कुछ सूखी-भीगे लकड़ियों से चुल्हा जलाने की कोशिश करती रहती... और दादा जी परेशान होते मम्मी की परेशानी देखकर... पर वो भी क्या करते? बारिश मे सब कुछ भीग ही जाता... और मेरी गाय.. जिसका बहुत प्यार से मैने नाम रखा था सुमन.. एक ही खूँटे पर बँधी-बँधी परेशान हो जाती, उसे एक जगह पर स्थित होना अच्छा नही लगता था... बहुत सीधी सी थी वो.. पर बारिश मे वो बहत परेशान होती... दूसरे खूँटे तक आने के लिये रँभाती रहती... पर हम भी बेबस थे...और एक बारिश मे उसने जाने कैसे.. रस्सी तोड ली... भागी बाहर... बाहर गिर पडी फिर फिर कभी ना उठी.... उसके बाद दूसरी गाय आयी... पर सुमन की जगह कोई नही ले सका.. सुमन की याद आते ही पिछली यादो से रिश्ता टूट गया.. वैसे जुड़ना चाहिये था.. पर टूट गया, कारण कि मेरे सामने वैसी ही एक धवल गाय रंभाते खडी थी... मै सोच रही थी कि काश ये मेरी सुमन होती... मै थोडी देर खडी रहे... मेरे सुमन होती तो दौडकर आती और मुझे चाटना शुरू करती.. यथार्थ कल्पना पर हावी हो गया... तब समझ मे आया कि मै ज्यादा भीग ली लौटना चाहिये..
पर दुख: मूल नही होता... और मन स्थिर नही होता... मन चल पडा... नये अनुभव की तरफ शायद कुछ ज्यादा ही भीग ली, अन्तःकरण से अपने ही अहसासों मे काफी बदलाव महसूस कर रही थी, बारिश मे धुल रहे पेड पौधे मुझे बहुत प्यारे लगते हैं, और आज तो जैसे हर डाली मुझे अपनी सी लग रही थी... इनके साथ जैसे अपने अन्दर भी कुछ अलग अनुभव हो रहा था... अपनी ही धडकनो को सुन रही थी... आनंद के सरोवर मे जैसे हिलोरे लेने लगी (हाँ असली नदी में तो नही उतरती तैरना नही आता :P)... और साथ मे मेरे डालियों पर झूमती पत्तियाँ, बहती धार की रूनझून, त्वचा को छूकर निकलती बूंदे पलको पर ठहरती बूंदे , एक जगह टिक कर इन सबके आनन्द मे मग्न, तभी नजर पडी, उस पेड पर जहाँ तोतें बारिश मे एक डाली से दूसरे पर चहलकदमी कर रहे थे|
तभी अचानक फिर से यथार्थ मे लौटी, अरे मैं यहाँ कैसे आ गयी.. मै तो लौट रही थी.. आसपास ध्यान दिया तो ध्यान मे आया कि इसी गली मे मोर मोरनी भी दिख जाते हैं, मोर याद आते ही, पंख फैलाये मोर की छवि भी आँखो के सामने तिर आयी... और ज्यादा नही ढूँढना पडा, युगल दिख ही गये, नाचता मोर, मोर के साथ मोरनी, मोर एक ही था, और साथ ४ मोरनी, और देखते ही देखते, विचार कहाँ से कहाँ परिवर्तित हुए, एक मोर जैसे कृष्णा की तरह बीच मे बंसी थामे, और इर्द-गिर्द गोपियाँ राधा संग नृत्य कर रही हों, फिर विचार पलटे, अरे ये क्या ये तो मोर है, कृष्णा थोडी ना है, फिर कान्हा तो बंसी बजाते थे, नाचने का काम गोपियों का था, ये मोर तो नाच रहा है.. फिर ध्यान आया कि कल तो कान्हा का जन्मदिन था, जन्माष्टमी, गाँव पर होती तो दादी डाँट-डपटकर व्रत करने के लिये तैयार करवा हीं देती मुझको, लेकिन अभी कितना अच्छा है, मैने तो जन्मदिन पर मिठाई खाई... आखिर किसी को तो अच्छे से सेलिब्रेट करना चाहिये, और मन ही मन सोच मुस्कुरा उठी.. फिर लगा कि.. अरे ये सही था कि गलत वो तो कान्हा ही बता सकते है... और फिर तलाश हुई कान्हा कि कान्हा ओ कान्हा...
मोर मुकुट पीताम्बर धारी
तुम तो हो घट-घट मे व्यापी
मेरी अखियाँ दरस को प्यासी
कहाँ मिलोगे हे गिरधारी
ना मै मीरा, ना मै राधा
ना मै जोगन, ना मै दासी
जानू ना मै प्रीत भी साची
ना ही मुझको भक्ति ही आती
गरज बरस के बरसे बदरीया
इत-उत ढूँढू तोके साँवरिया
सोचूँ और फिर खुद पर हँस लूँ
बन के झूमूं मै तो बावरियाँ
ये नही गोकुल, ना ही वृन्दावन
कहां मिलोगे, ओ मेरे मनमोहन
ना मै मीरा, ना मै राधा
क्या दोगे फिर भी तुम दरसन
क्या दोगे मुझको भी दरसन
शायद और कुछ भी सोचा हो... (गाया नही..) खाली पीली मे लोगो की अच्छी नींद उड जाती... हाँ पर रास्ते पर गुनगुनाने का पहला अवसर था... शायद बारिश की बूँदो और कान्हा की तलाश ने शराफत (लाज) का वो पर्दा उडा दिया... होश मे जाने कब आयी... याद नही आ रहा है... घर आने के बाद भी वो मस्ती रही... दैनिक काम मे ... आदतन लगी रही.. लेकिन वाकई जो मस्ती वही रही, वो जा नही रही थी... लेकिन वक्त बहुत रहम है... धीरे धीरे वो अहसास ऐसी याद मे परिवर्तित होता जा रहा है, जिसे याद तो किया जा सकता है, पर ना जिसकी अभिव्यक्ति संभव हो पा रही है...ना जिसका अनुभव हो पा रहा है... कुछ बेचैनी सी छायी है... आलम यह है कि खुद को नही समझ मे आ रहा है कि क्या चाहिये... कुछ भी समझ मे नही आ रहा है... बार बार याद कर रही हूँ, बरसता मौसम, बारिश की छम-छम, मोर का नाच, तोतों की चहलकदमी, धुली पत्तियाँ... पर वो सब कुछ ऐसा ही है कि मानो फिल्म चल रही है, पर मौसम की बहार से मन अछूता है... काश ऐसी सुबह फिर से आये.. और उस दशा को मै फिर से प्राप्त होऊँ :)
बुधवार, 30 जुलाई 2008
क्या आप सफल अभिभावक हैं?
हालाँकि यह सवाल पूछने या जवाब बताने का मेरा कोई हक नही बनता, मै खुद को अभी ३ साल से बडा नही मानती, कारण कि कई बार मेरा भाई जो कि अभी ५ साल का है, ऐसी बातें बोलता है, जिन्हे सुनकर खुद को लगेगा कि इसके आगे तो अपनी सोच की कोई हैसियत ही नही है!
कई बार मेरी बहने भी मुझे गुरू की जगह दिख जाती है, और लल्ली से आप परिचित ही हैं, इनके सामने खुद को बडा़ मानना...
फिर भी अक्सर मुझे लगता है कि जिस दौर से मै गुजर रही हूँ, वो अभिभावक और बचपन के बीच की कडी है, जहाँ मै खुद भी सीख रही हूँ, और दूसरों को सिखा भी रही हूँ।
इस तरह सोचने के कई कारण हो सकते हैं.. मै कारण बताने के पीछे ना जाकर, सीधे अपनी बात पर आ रही हूँ।
मेरे पास अक्सर ऐसे लोग आते हैं, जो अपने बच्चे के भविष्य के लिये व्यथित हैं, चिंतित हैं, अब ये तो अच्छी बात है, पर कभी कभी यह चिन्ता इतनी ज्यादा होती है कि उस बच्चे का जीना ही मुश्किल हो जाता है।
कई ऐसे उदाहरण मेरे सामने आते हैं, हँसता खेलता बच्चा किसी मानसिक बीमारी का शिकार हो जाता है, अच्छा सा बच्चा उदण्ड हो जाता है, मेधावी बच्चा पढने से डर जाता है, खेलकूद मे आगे रहने वाला बच्चा अपने आपको एक कमरे बंद कर लेता है, और भी ना जाने कितने तरह से परेशान होता है बचपन, और जब यही बचपन आगे बढता है तो इसके इतने उल्टे-सीधे परिणाम निकलते हैं, जिसकी तरफ़ सोचा भी नही जा सकता।
आप माने या ना माने, इसमे सबसे ज्यादा गलती अभिभावक की ही होती है, बाकी की कसर शिक्षक और दूसरे लोग पूरा कर देते हैं। ऐसे मे आप चिल्लाते रहिये कि आज की युवा-पीढी़ भटक गयी है, आज ये आज वो।ये तो होना ही है, जब बीज ही सही ढंग से नही डाला जायेगा तो बढिया फसल के लिये आशा रखना व्यर्थ ही है।
कई बार देखा है कि जो अभिभावक अपने कुछ सपने/अरमान पूरा नही कर पाये होते हैं, वो अपने बच्चो से उम्मीद रखते हैं कि बच्चा वो सपना पूरा करे। यह गलत नही है, आपका हक बनता है, परन्तु आपका बच्चा भी एक अलग व्यक्तित्व का मालिक है, उसके भी कुछ अपने सपने हैं, कुछ अलग गुणवत्ता है, जो बचपन से जग-जाहिर होने ही लगती है।
मसलन कुछ बच्चे पढा़कू होते हैं, उसमे भी किसी विषय मे उनको बहुत ज्यादा रूचि होती है तो किसी विषय मे बहूत कम; ठीक इसके उल्टे कुछ बच्चो को किताब नाम से ही डर लगता है, पढना तो दूर की बात है।
सिर्फ इतना ही नही यह बिल्कुल जरूरी नही कि आपको जे चीज पसन्द नही वो वो आपके बच्चे को भी नही पसंद हो। आखिर उसे भी अपनी पसन्द ना पसन्द से जीने का हक है। सिर्फ आपकी ही निजी जिन्दगी नही है, बल्कि उस बच्चे की भी है। इसलिये जरूरी बनता है कि, आप उसके व्यक्तित्व को समझे जाने, अगर बच्चे के भविष्य को सही रूप-रेखा देना आपकी जिम्मेदारी है तो उसके साथ ही, उसका व्यक्तित्व विकसित हो यह भी आपकी ही जिम्मेदारी है
और यह तभी हो सकेगा जब आप उसे खिलने को पूरा मौका दें, जब आप उसके पथ प्रदर्शक बने ना कि, अपने साथ अपने रास्ते पर चलने पर मजबूर करें।
आप आदर्शवादी हैं तो यह बिल्कुल जरूरी नही कि वो भी आदर्शवादी ही होगा, और अगर आपका आदर्श उससे उसका बचपन छीन रहा है फ़िर तो वो किसी भी सूरत मे आदर्शवादी नही बनेगा, फिर वो जो बनेगा/बन सकता है, उसका अन्दाजा लगाना भी मुश्किल है।
कुछ दिन पहले आगरा से प्रतिष्ठित परिवार से मेरी बात हुई, वो बहुत परेशान थे, उनका इकलौटा बेटा जो कि मात्र १५ साल का था, गलत संगति मे पड गया, हर तरह से उन्होने उसे समझाने की कोशिश की पर वो नही सुधरा। कितने ही मनोचिकित्सक को दिखलाया गया, कितनी ही काउँसलिंग हूई पर सब बेअसर। जब मेरे सम्पर्क मे लोग आये तो उन्हे किसी ने बताया था कि वह किसी प्रेत-बाधा से ग्रसित है। जब मैने उस लडके से बात की तो एक बात पता चली कि, उसके अन्दर इतना आक्रोश भरा हुआ था, अपने मम्मी पापा को सिर्फ़ उनको तंग करने के लिये वो सारी गलत हरकते करता था, बाद मे उसको आदत बन गयी।
उसे बिल्कुल परवाह नही थी कि लोग क्या कहते हैं, बल्कि उसे मजा आता जब लोग ये कहते कि बेचारे शर्मा जी (काल्पनिक नाम) एक ही औलाद है और ऐसी निकली, खुद तो आदर्श के प्रतिमूर्ती हैं और जब शर्मा जी को यह सब सूनकर रोना आता तो उसको मजा आता।
ऐसे ही मुझे एक केस मिला था, लडकी इतना पढती थी कि वो पढना ही उसके पागल होने का कारण बन गया था, वो तब भी यही कहती, पापा मै आपको जरूर दिखाऊँगी कि मै भी कुछ कर सकती हूँ, हर वक्त की एक ही रट, और किताबे तो जैसे वो खुद ही। आदि से अन्त तक उसे सब जबानी याद था।
दूर ना जाकर एकदम आज की बात कर रही हूँ, मै अपने भाई को स्कूल से ला रही थी, भाई के साथ एक और बच्चा निकला, वो बेचारा डरा सहमा सा, उसकी मम्मी उसे लेने आई हुई थी, मम्मी को देखते ही वो और ही सहम गया।
रास्ते मे भाई बताते आया कि दीदी ये सौरभ है, ये ना दौडने मे तेज है पर उसकी मम्मी उसे हमेशा पढाई पढाई करके डाँटती रहती हैं ना, इसलिये वो हमेशा डरा रहता है, और आज ना वो बीमार पड गया था।
कुछ देर की शान्ति के बात गौरव ने कहा झुको,
क्यों?
मुझे ना आपको कुछ देना है।
तो दो ना।
ना पहले झुको। और उसने मुझे गले लगा लिया।
अरे बस बस घर पर नही है हम, रास्ते मे हैं, बीच रास्ते मे खडे नही होते कोई गाडी टक्कर दे सकती है।
दीदी, ये इसलिये था क्योंकि मै भी तो नही पढता था, पर आप सौरभ की मम्मी की तरह मुझे नही डाँटती थी, तो मेरा प्यार आज आपके लिये १००० हो गया। ( ये उसका अपना तरीका है, अपना प्यार दिखाने के लिये, १००० सबसे ज्यादा और ० सबसे कम)
अच्छा बेटा तो फ़िर तुमने पढना क्यों शुरू कर दिया?
वो इसलिये क्योंकि आप मुझे मेरे मन का काम करने देती हो, तो मेरा भी फर्ज बनता है ना कि मै आपके मन का काम करूँ। :) ध्यान दिजिये कि मेरा भाई अभी क्लास १ मे है, और कोई आकाश से उतरा हूआ फरिश्ता भी नही है, आपके बच्चो के जैसा ही एक सामान्य सा बच्चा है। जब उसकी सोच इस तरह से हो सकती है तो मुझे लगता है कि सभी बच्चो की सोच ऐसी हो सकती है। जरूरत है सही तरीके से देख रेख की।
इस पर अभी बहुत कुछ कहना है.. पर अगली कडी मे.. और हाँ अभिभावक गण मुझे माफ करें, मुझे कोई हक नही बनता किसी को चोट थ पहुँचाने का, पर मुझे लगा कि किसी ना किसी को तो इस पर बात करनी चाहिये.. तभी कोई सही रास्ता निकल कर आ सकता है, और जितनी भी महिलायें मेरे लेख को पढ रही हों, प्लीज मुझे ये मत सुनाना कि "जब तुम माँ बनोगी तब समझ मे आयेगा कि बच्चे को कैसे सम्भालते हैं" जो कुछ भी शिकायत होगी मै सूनूँगी पर पूरी बात खत्म होने के बाद।
तो मिलते हैं अगली कडी़ मे।
कई बार मेरी बहने भी मुझे गुरू की जगह दिख जाती है, और लल्ली से आप परिचित ही हैं, इनके सामने खुद को बडा़ मानना...
फिर भी अक्सर मुझे लगता है कि जिस दौर से मै गुजर रही हूँ, वो अभिभावक और बचपन के बीच की कडी है, जहाँ मै खुद भी सीख रही हूँ, और दूसरों को सिखा भी रही हूँ।
इस तरह सोचने के कई कारण हो सकते हैं.. मै कारण बताने के पीछे ना जाकर, सीधे अपनी बात पर आ रही हूँ।
मेरे पास अक्सर ऐसे लोग आते हैं, जो अपने बच्चे के भविष्य के लिये व्यथित हैं, चिंतित हैं, अब ये तो अच्छी बात है, पर कभी कभी यह चिन्ता इतनी ज्यादा होती है कि उस बच्चे का जीना ही मुश्किल हो जाता है।
कई ऐसे उदाहरण मेरे सामने आते हैं, हँसता खेलता बच्चा किसी मानसिक बीमारी का शिकार हो जाता है, अच्छा सा बच्चा उदण्ड हो जाता है, मेधावी बच्चा पढने से डर जाता है, खेलकूद मे आगे रहने वाला बच्चा अपने आपको एक कमरे बंद कर लेता है, और भी ना जाने कितने तरह से परेशान होता है बचपन, और जब यही बचपन आगे बढता है तो इसके इतने उल्टे-सीधे परिणाम निकलते हैं, जिसकी तरफ़ सोचा भी नही जा सकता।
आप माने या ना माने, इसमे सबसे ज्यादा गलती अभिभावक की ही होती है, बाकी की कसर शिक्षक और दूसरे लोग पूरा कर देते हैं। ऐसे मे आप चिल्लाते रहिये कि आज की युवा-पीढी़ भटक गयी है, आज ये आज वो।ये तो होना ही है, जब बीज ही सही ढंग से नही डाला जायेगा तो बढिया फसल के लिये आशा रखना व्यर्थ ही है।
कई बार देखा है कि जो अभिभावक अपने कुछ सपने/अरमान पूरा नही कर पाये होते हैं, वो अपने बच्चो से उम्मीद रखते हैं कि बच्चा वो सपना पूरा करे। यह गलत नही है, आपका हक बनता है, परन्तु आपका बच्चा भी एक अलग व्यक्तित्व का मालिक है, उसके भी कुछ अपने सपने हैं, कुछ अलग गुणवत्ता है, जो बचपन से जग-जाहिर होने ही लगती है।
मसलन कुछ बच्चे पढा़कू होते हैं, उसमे भी किसी विषय मे उनको बहुत ज्यादा रूचि होती है तो किसी विषय मे बहूत कम; ठीक इसके उल्टे कुछ बच्चो को किताब नाम से ही डर लगता है, पढना तो दूर की बात है।
सिर्फ इतना ही नही यह बिल्कुल जरूरी नही कि आपको जे चीज पसन्द नही वो वो आपके बच्चे को भी नही पसंद हो। आखिर उसे भी अपनी पसन्द ना पसन्द से जीने का हक है। सिर्फ आपकी ही निजी जिन्दगी नही है, बल्कि उस बच्चे की भी है। इसलिये जरूरी बनता है कि, आप उसके व्यक्तित्व को समझे जाने, अगर बच्चे के भविष्य को सही रूप-रेखा देना आपकी जिम्मेदारी है तो उसके साथ ही, उसका व्यक्तित्व विकसित हो यह भी आपकी ही जिम्मेदारी है
और यह तभी हो सकेगा जब आप उसे खिलने को पूरा मौका दें, जब आप उसके पथ प्रदर्शक बने ना कि, अपने साथ अपने रास्ते पर चलने पर मजबूर करें।
आप आदर्शवादी हैं तो यह बिल्कुल जरूरी नही कि वो भी आदर्शवादी ही होगा, और अगर आपका आदर्श उससे उसका बचपन छीन रहा है फ़िर तो वो किसी भी सूरत मे आदर्शवादी नही बनेगा, फिर वो जो बनेगा/बन सकता है, उसका अन्दाजा लगाना भी मुश्किल है।
कुछ दिन पहले आगरा से प्रतिष्ठित परिवार से मेरी बात हुई, वो बहुत परेशान थे, उनका इकलौटा बेटा जो कि मात्र १५ साल का था, गलत संगति मे पड गया, हर तरह से उन्होने उसे समझाने की कोशिश की पर वो नही सुधरा। कितने ही मनोचिकित्सक को दिखलाया गया, कितनी ही काउँसलिंग हूई पर सब बेअसर। जब मेरे सम्पर्क मे लोग आये तो उन्हे किसी ने बताया था कि वह किसी प्रेत-बाधा से ग्रसित है। जब मैने उस लडके से बात की तो एक बात पता चली कि, उसके अन्दर इतना आक्रोश भरा हुआ था, अपने मम्मी पापा को सिर्फ़ उनको तंग करने के लिये वो सारी गलत हरकते करता था, बाद मे उसको आदत बन गयी।
उसे बिल्कुल परवाह नही थी कि लोग क्या कहते हैं, बल्कि उसे मजा आता जब लोग ये कहते कि बेचारे शर्मा जी (काल्पनिक नाम) एक ही औलाद है और ऐसी निकली, खुद तो आदर्श के प्रतिमूर्ती हैं और जब शर्मा जी को यह सब सूनकर रोना आता तो उसको मजा आता।
ऐसे ही मुझे एक केस मिला था, लडकी इतना पढती थी कि वो पढना ही उसके पागल होने का कारण बन गया था, वो तब भी यही कहती, पापा मै आपको जरूर दिखाऊँगी कि मै भी कुछ कर सकती हूँ, हर वक्त की एक ही रट, और किताबे तो जैसे वो खुद ही। आदि से अन्त तक उसे सब जबानी याद था।
दूर ना जाकर एकदम आज की बात कर रही हूँ, मै अपने भाई को स्कूल से ला रही थी, भाई के साथ एक और बच्चा निकला, वो बेचारा डरा सहमा सा, उसकी मम्मी उसे लेने आई हुई थी, मम्मी को देखते ही वो और ही सहम गया।
रास्ते मे भाई बताते आया कि दीदी ये सौरभ है, ये ना दौडने मे तेज है पर उसकी मम्मी उसे हमेशा पढाई पढाई करके डाँटती रहती हैं ना, इसलिये वो हमेशा डरा रहता है, और आज ना वो बीमार पड गया था।
कुछ देर की शान्ति के बात गौरव ने कहा झुको,
क्यों?
मुझे ना आपको कुछ देना है।
तो दो ना।
ना पहले झुको। और उसने मुझे गले लगा लिया।
अरे बस बस घर पर नही है हम, रास्ते मे हैं, बीच रास्ते मे खडे नही होते कोई गाडी टक्कर दे सकती है।
दीदी, ये इसलिये था क्योंकि मै भी तो नही पढता था, पर आप सौरभ की मम्मी की तरह मुझे नही डाँटती थी, तो मेरा प्यार आज आपके लिये १००० हो गया। ( ये उसका अपना तरीका है, अपना प्यार दिखाने के लिये, १००० सबसे ज्यादा और ० सबसे कम)
अच्छा बेटा तो फ़िर तुमने पढना क्यों शुरू कर दिया?
वो इसलिये क्योंकि आप मुझे मेरे मन का काम करने देती हो, तो मेरा भी फर्ज बनता है ना कि मै आपके मन का काम करूँ। :) ध्यान दिजिये कि मेरा भाई अभी क्लास १ मे है, और कोई आकाश से उतरा हूआ फरिश्ता भी नही है, आपके बच्चो के जैसा ही एक सामान्य सा बच्चा है। जब उसकी सोच इस तरह से हो सकती है तो मुझे लगता है कि सभी बच्चो की सोच ऐसी हो सकती है। जरूरत है सही तरीके से देख रेख की।
इस पर अभी बहुत कुछ कहना है.. पर अगली कडी मे.. और हाँ अभिभावक गण मुझे माफ करें, मुझे कोई हक नही बनता किसी को चोट थ पहुँचाने का, पर मुझे लगा कि किसी ना किसी को तो इस पर बात करनी चाहिये.. तभी कोई सही रास्ता निकल कर आ सकता है, और जितनी भी महिलायें मेरे लेख को पढ रही हों, प्लीज मुझे ये मत सुनाना कि "जब तुम माँ बनोगी तब समझ मे आयेगा कि बच्चे को कैसे सम्भालते हैं" जो कुछ भी शिकायत होगी मै सूनूँगी पर पूरी बात खत्म होने के बाद।
तो मिलते हैं अगली कडी़ मे।
रविवार, 27 जुलाई 2008
अब नही तो कब?
लगातार हो रहे विस्फोटो से मन विचलित है, और कही ना कही कुछ न कर पाने कि स्थिती भी दर्द को बढावा देने मे सहयोगी बन रही है, पर मेरा ऊर्जा चिकित्सक दोस्तो से निवेदन है कि कम से कम हम इस दर्द के शिकंजे मे रहकर न जीये। चाहे आप अल्फ़ा हीलर हो, रेकी मास्टर हो या किसी भी अन्य तकनीक से हो, अगर आप दुरस्थ ऊर्जा चिकित्सा कर सकते हैं तो फिर आप कुछ तो कर ही सकते हैं।
वैसे तो यह एक नियम है कि बिना मरीज से पूछे उसका इलाज नही किया जा सकता, पर आपातकाल मे यह नियम लागू नही होता है।
वैसे मै जानती हूँ कि कई मित्र इस दिशा के तरफ अग्रसर होंगे, पर हम ये भी जानते हैं कि अकेले अकेले लडने की बजाय अगर एक साथ ऊर्जा किरणे प्रवाहित की जाये तो, वो ज्यादा काम करती है। मै चाहती हूँ कि (यकिनन आप भी चाहते होंगे) हम इस दिशा मे एक जूट होकर कुछ कर सके, अस्पताल मे डॉक्टर्स अपना काम कर रहे हैं, कम से कम हम अपने घर मे बैठे इतना तो कर ही सकते हैं, कौन जाने कि हमारी जिन्दगी से निकाले गये ये चन्द घंटे, कितनो कि जिन्दगी बचाने मे सफल हो जाये।
आप जहाँ भी है, जिस क्षेत्र मे भी है, अपने आसपास के ऊर्जा चिकित्सको की मदद लिजीये, अपने दोस्तो को एकत्रित किजिये, और अगर आप ऊर्जा चिकित्सक नही भी हैं तो भी दूसरो तक ये बात ले जाईये, साथ दिजिये उनका, जिनक सबकुछ मिटने वाला है।
कुछ देर व्यवसाय की जिन्दगी से दूर जिन्दगी के नाम करने का संकल्प लिजिये तभी वास्तव मे हमे खूद पर यकिन होगा कि वास्तव मे हम अभी इंसान हैं, संवेदनायें सिर्फ़ दिखाने के लिये नही कुछ कर दिखाने के लिये अभी जागृत हैं।
दोस्तो यह पोस्ट पढकर कॉमेन्ट देने के लिये नही, शक्ति जागृत करने के लिये पढी जाये तो दिल से खूशी होगी।
आपकी गरिमा
वैसे तो यह एक नियम है कि बिना मरीज से पूछे उसका इलाज नही किया जा सकता, पर आपातकाल मे यह नियम लागू नही होता है।
वैसे मै जानती हूँ कि कई मित्र इस दिशा के तरफ अग्रसर होंगे, पर हम ये भी जानते हैं कि अकेले अकेले लडने की बजाय अगर एक साथ ऊर्जा किरणे प्रवाहित की जाये तो, वो ज्यादा काम करती है। मै चाहती हूँ कि (यकिनन आप भी चाहते होंगे) हम इस दिशा मे एक जूट होकर कुछ कर सके, अस्पताल मे डॉक्टर्स अपना काम कर रहे हैं, कम से कम हम अपने घर मे बैठे इतना तो कर ही सकते हैं, कौन जाने कि हमारी जिन्दगी से निकाले गये ये चन्द घंटे, कितनो कि जिन्दगी बचाने मे सफल हो जाये।
आप जहाँ भी है, जिस क्षेत्र मे भी है, अपने आसपास के ऊर्जा चिकित्सको की मदद लिजीये, अपने दोस्तो को एकत्रित किजिये, और अगर आप ऊर्जा चिकित्सक नही भी हैं तो भी दूसरो तक ये बात ले जाईये, साथ दिजिये उनका, जिनक सबकुछ मिटने वाला है।
कुछ देर व्यवसाय की जिन्दगी से दूर जिन्दगी के नाम करने का संकल्प लिजिये तभी वास्तव मे हमे खूद पर यकिन होगा कि वास्तव मे हम अभी इंसान हैं, संवेदनायें सिर्फ़ दिखाने के लिये नही कुछ कर दिखाने के लिये अभी जागृत हैं।
दोस्तो यह पोस्ट पढकर कॉमेन्ट देने के लिये नही, शक्ति जागृत करने के लिये पढी जाये तो दिल से खूशी होगी।
आपकी गरिमा
शनिवार, 26 जुलाई 2008
शुक्रवार, 25 जुलाई 2008
अच्छा क्या है? बुरा क्या है?
काफी दिनो से एक ही तरह के सवाल जवाब चल रहे हैं आजकल, मुझे लग रहा है कि बच्चे(भाई-बहन) बडे हो रहे हैं, खासकर मेरा भाई जो कि क्लास १ मे पढ रहा है, रोज आकर कोई एक विषय पर बात होती है, पूरे कहानी मे एक ही सवाल उठता है कि "अच्छा किसे कहते हैं, बूराई की परिभाषा क्या है"?
उससे बात करते करते शायद मै खूद को भी समझा रही हूँ कि अच्छा क्या है बूरा क्या है? क्योंकि अगर कोई ऐसा जवाब दे दिया जो व्यवहारिक रूप से मान्य हो ही नही पाये तो ऐसे जवाब का क्या मतलब रह जायेगा? और टालने के लिये मै कोई सा भी जवाब देना कभी पसन्द नही करती हूँ।
एक दिन वो मुझसे खूद ही बोल पडा दीदी.. आप बताओ, क्रोध, अहंकार यह सब गंदे हैं?
मैने कहा कि हा बेटा यह सब ठीक नही, गुस्से मे आकर आप कोई काम ठीक से नही कर पाते और जो लोग घमंडी होते हैं उन्हे कोई पसन्द नही करता। उसने जवाब सूना फ़िर खेलने लग गया, थोडी देर मे ही उल्टी सीधी हरकते करने लगा, इतना की अब मुझे गुस्सा आ ही गया, और मैने डाँतते हूए कहा कि ऐसे काम नही करने चाहिये, आदत गंदी होती है।
सबको परेशानी हो सकती है। इस पर वो बोल पडा मतलब कि अभी आप गुस्से मे हो? मैने कहाँ कि हाँ, अभी गुस्से मे हूँ, अगर ऐसे ही छोड दूँगी तो तुम्हे समझ मे कैसे आयेगा कि गलत क्या है सही क्या है? फ़िर वो हँस पडा, अभी तो आपने कहा है कि, गुस्सा अच्छी बात नही है!!!
मै चुप थी.. तो वो ही बोला... मुझे पता है... कोई भी आदत गलत या सही नही होती, गलत और सही वक्त होता है, और वक्त की माँग होती है। क्लास १ के बच्चे के मूँह से ये बात सुनना अजीब सा लग सकता है, पर उसके मूँह से सुनना कभी अजीब सा नही लगा, रहरहकर वो जाने किस दुनिया से बोलता है। खैर मुझे अपनी गलती समझ मे आयी और मैने उससे माफ़ी भी मांग लिय और ध्यान रखा कि आगे से बोलूँ सोचसमझ कर ही बोलूँ।
जवाब देने के पहले खूद को वहाँ खडा रखकर देखना ही पडेगा।
ऐसे कई सारे सवाल-जवाब हैं जो हम भाई बहनो के बीच चलते रहते हैं, उ़सी मे एक और सवाल जुडता है... हिंसा और अहिंसा मे कितना फर्क है?
इसी पर अधारित लेख है ज्ञानदत्त जी का। सुबह सुबह ये लेख पढा तो मेरे दिमाग मे भी इस विषय पर लिखने के लिये कुलबुलाहट मच गयी, उसी तर्ज पर यह लेख लिख रही हूँ।
वह पूरा लेख ही विचारपूर्ण है, लेख वही पढिये नही तो मुझे पूरी के पूरी सामग्री यहाँ चिपकानी पडेगी।
वास्तव मे अहिंसा और हिंसा के क्या फर्क है? समझना समझाना बहूत मुश्किल है। मेरी दादी यहाँ आती हैं तो हम रोज ही पागल हो जाते हैं, मच्छर नही मारने देती, और तो और खिडकियाँ खोल देती हैं "भाग जा लो भगवान जी, ना त ई तहरा के मार दिह स" भाग जाओ भगवान जी वरना ये तुमको मार देंगी, उल्टे होता ये है कि अंदर के मच्छर बाहर तो जाते नही कुछ और आ जाते हैं, और हम हँसते है कि ईया भगवान जी के हमनी के हाथे वैकुंठ जाये के मन करत बा, भगवान जी को हमारे हाथ वैकुंठ जाने का मन कर रहा है।
और आजकल तो जबसे मच्छरो को मारने का रैकेट आया है, अपने हाथो से मार देते हैं, मेरी दादी को मच्छरो को को भी मारना अपराध बोध से ग्रसित कर देता था.. वो उदास हो जाती थी... और आज तक मुझे उदासी नही आयी। और वहीं उनके कई ऐसे काम होते हैं, जिनसे हमको अपराधबोध लगता है पर, उन्हे लगता है कि ये समाज की माँग है खैर।
ज्ञानदत्त जी पुछते हैं कि "हत्या का अपराधबोध किस स्तर से शुरू होत है" ?
इसका जवाब बहूत ही मुश्किल है, मेरा एक दोस्त जो हाल ही मे किसी मुजरिम को पकड के आया था, वो बता रहा था कि जिस मुजरिम को पकडा गया है, वो अभी मात्र १८ साल का है और उसने ३ लोगो को आराम से मार दिया, पूछताछ पर बताया उसने कि उसने सिर्फ़ ये देखने के बाद मारा कि मारने के बाद कैसा लगता है?
मेरा दोस्त बहूत उदास होकर बता रहा था कि गरिमा उसके चेहरे पर थोडा भी गम नही था, वो लडका बडे आराम से अपना किस्सा सुना रहा था, वो बहूत रोमांचित था.....
उस लडके को अंत तक अपराध बोध नही हूआ! क्यों?
ओशो कहते हैं "जो काम आपको आपके दिल को सुकून पहुँचाये सो शुभ है, और जो काम आपके सुकून मे बाधक है, वो अशुभ है" पर अब इस लडके के बारे मे क्या कहते ओशो?
जिसने ३ लोगो को सिर्फ़ रोमांच के लिये बेरहमी से मार डाला और उसे बहूत मजा आया.. क्या यह भी शुभ था?
मेरे सहेली के दादा जी, उनको भी मेरी दादी की तरह मच्छर मक्खी मारने से परहेज है, पर किसी को कैसे रूलाते हैं? उनसे अच्छा भला कौन जान सकता है? क्या किसी के आँसू को देखकर उनके दिल मे सूकुन मिलता होगा? और अगर हाँ तो कैसे?
"मुनि अहिंसा को मुंह पर सफेद पट्टी बांध एक एक्स्ट्रीम पर ले जाते हैं। मुन्ना बजरंगी या अल केपोने जैसे शार्प शूटर उसे दूसरे एक्स्ट्रीम पर। सामान्य स्तर क्या है?" ज्ञानदत्त जी कहते हैं।
बिल्कुल सही बोलते हैं। दोनो ही एक्स्ट्रीम पर हैं, और इसलिये दोनो ही अशुभ हैं? क्योंकि दोनो ने ही जीवन से अपना मूँह मोड लिया है, एक जीव को इतना बचा रहा है कि अच्छे बूरे का फ़र्क ही भूल गया, कोई विषैला हो सकता है, जन जाति को परेशान कर सकता है, इस बात से उनको कोई फ़र्क नही पडता। वो भी एक तरह से विनाश के कगार पर खडे हैं। ठीक कुछ ऐसे की पूलिस चोर को बोल रहा है कि मै आँखे बन्द कर लेता हूँ तुम चोरी कर लो!!!
दुसरा लोगो का अपने हाथो ही विनाश कर रहा है।
अन्तर क्या है दोनो मे? मुझे तो कुछ नही लगता।
अब "सामान्य स्तर की बात" ओशो कहते हैं कि ये जीवन बीणा के तार की तरह है, जैसे की बीणा का तार अगर बहूत ढीला हो तो भी स्वर लहरी नही निकलेगी, और कडक होने पर भी नही।
स्वर निकलने के लिये तार का सही समन्वय होना जरूरी है। खैर मै बीणा के बारे मे नही जानती, पर इतना समझ मे आ रहा है कि उन्होने जो कहा वो एकदम सही कहा, मेरे चाचा जी ढोलक के ताल को ठीक करने के लिये पेंच को बारबार सही स्थिती मे ले जाते थे।
अब मै अपने शब्दो मे कहूँ तो शुभ वो है जिससे किसी का जीना आसान हो जाये और खूद को भी तकलीफ ना हो, और अशुभ वो है जिसके कारण कई लोग तकलीफ मे आ जायें।
यह परिभाषा मुझे सही लगती है।
मच्छर को मारना अपने मजबूरी है, नही मारेंगे तो वो हमे मार डालेंगे, आतंकवादी को मारना मजबूरी है, नही मारो तो हमे मार डालेंगे।
पर किसी ऐसे शक्स के आँखो मे आँसू भर ला देना, जिससे समाज कोई खतरा नही है, वो अशुभ है, भले वो इंसान पागल ही क्यों ना हो?
किसी ऐसे का मजाक बना देना जो आप पर पलटवार करने के मे नाकाबिल हो, और वो दूखी हो जाये अशूभ है।
अपने बच्चो को खिलाने के लिये किसी और का पेट काटना अशुभ है, पर किसी ऐसे का पैसा ले लेना, जिसके कुत्ते भी राजाओ की जिन्दगी बिता रहे हैं, पूरी तरह शुभ है।
ये मेरा अपना मानना है। मुझे आज भी याद है, स्कुल मे मै दादा के नाम से जानी जाती थी, जबकि मैने कभी किसी पर गलत आरोप नही लगाया, पर हाँ उन प्रत्येक हाथो को रोकने की कोशिश की जो बेमतलब किसी का गिराहबान पकडने के लिये आतूर होते थे। मै अपनी तारीफ़ नही कर रही हूँ, बस अपने विचार व्यक्त कर रही हूँ।
मुझे हमेशा से लगता आया है कि मेरा एक झुठ अगर किसी को हँसा सकता है, नयी जान दे सकता है तो वो पूर्णतया शूभ है, और ऐसा कोई सच जो किसी को तकलीफ दे सकता है वो अशूभ है।
इस बारे मे मै हमेशा प्रैक्टिकल रही हूँ। फ़िर भी कभी कभी ये सवाल परेशान करता है कि क्या आजतक जो किया वो सही किया?
पिछले दिनो मै एक सहेली से मिली, उसकी शादी हो गयी है, पति भी साथ मे ही थे, वो बोलने लगी गरिमा ये जो हैं ना बिल्कुल तुम्हारी तरह हैं, बेमतलब का दूसरो के लिये झगडा मोल लेते हैं, उस समय तो मै कुछ नही बोली.. पर मेरे दिमाग मे चल रहा थ... क्या आजतक जो मै करती आयी हूँ, वो सब बेमलब था?
मेरी उस सहेली के लिये भी मैने कई बार लोगो से झगडा मोल लिया था... तो क्या वो भी उसके नजर मे बेमतलब का था? सवाल जब गहरायें तो मुझे आखिरकार उससे पूछना ही पडा.. वो बिल्कुल सकपका गयी.. आप समझिये उसकी सकपकाहट मेरे सवाल के लिये नही था, बल्कि इसलिये था कि कही उसके पतिदेव के सामने ये बात ना खूल जाये कि आखिर वो झगडे मैने क्यों किये थे?
खैर उसकी दशा मै समझ गयी और चूप हो गयी... और मेरे मन एक अजीब सी शांति छायी कि नही मैने सब अच्छे काम ही किये हैं और आज फ़िर से किया.. और यही शुभ है.. अगर मेरी किसी बात से उसके जिन्दगी मे कोई अनबन आ जाता तो वो अशूभ होता.... अभी इसपर सोचने को बहूत है... पर अब वक्त इजाजत माँग रहा है... मै इस विषय पर एक बार फिर से जरूर लिखूँगी तब तक आप भी अपने अपने विचार जरूर रखियेगा।
उससे बात करते करते शायद मै खूद को भी समझा रही हूँ कि अच्छा क्या है बूरा क्या है? क्योंकि अगर कोई ऐसा जवाब दे दिया जो व्यवहारिक रूप से मान्य हो ही नही पाये तो ऐसे जवाब का क्या मतलब रह जायेगा? और टालने के लिये मै कोई सा भी जवाब देना कभी पसन्द नही करती हूँ।
एक दिन वो मुझसे खूद ही बोल पडा दीदी.. आप बताओ, क्रोध, अहंकार यह सब गंदे हैं?
मैने कहा कि हा बेटा यह सब ठीक नही, गुस्से मे आकर आप कोई काम ठीक से नही कर पाते और जो लोग घमंडी होते हैं उन्हे कोई पसन्द नही करता। उसने जवाब सूना फ़िर खेलने लग गया, थोडी देर मे ही उल्टी सीधी हरकते करने लगा, इतना की अब मुझे गुस्सा आ ही गया, और मैने डाँतते हूए कहा कि ऐसे काम नही करने चाहिये, आदत गंदी होती है।
सबको परेशानी हो सकती है। इस पर वो बोल पडा मतलब कि अभी आप गुस्से मे हो? मैने कहाँ कि हाँ, अभी गुस्से मे हूँ, अगर ऐसे ही छोड दूँगी तो तुम्हे समझ मे कैसे आयेगा कि गलत क्या है सही क्या है? फ़िर वो हँस पडा, अभी तो आपने कहा है कि, गुस्सा अच्छी बात नही है!!!
मै चुप थी.. तो वो ही बोला... मुझे पता है... कोई भी आदत गलत या सही नही होती, गलत और सही वक्त होता है, और वक्त की माँग होती है। क्लास १ के बच्चे के मूँह से ये बात सुनना अजीब सा लग सकता है, पर उसके मूँह से सुनना कभी अजीब सा नही लगा, रहरहकर वो जाने किस दुनिया से बोलता है। खैर मुझे अपनी गलती समझ मे आयी और मैने उससे माफ़ी भी मांग लिय और ध्यान रखा कि आगे से बोलूँ सोचसमझ कर ही बोलूँ।
जवाब देने के पहले खूद को वहाँ खडा रखकर देखना ही पडेगा।
ऐसे कई सारे सवाल-जवाब हैं जो हम भाई बहनो के बीच चलते रहते हैं, उ़सी मे एक और सवाल जुडता है... हिंसा और अहिंसा मे कितना फर्क है?
इसी पर अधारित लेख है ज्ञानदत्त जी का। सुबह सुबह ये लेख पढा तो मेरे दिमाग मे भी इस विषय पर लिखने के लिये कुलबुलाहट मच गयी, उसी तर्ज पर यह लेख लिख रही हूँ।
वह पूरा लेख ही विचारपूर्ण है, लेख वही पढिये नही तो मुझे पूरी के पूरी सामग्री यहाँ चिपकानी पडेगी।
वास्तव मे अहिंसा और हिंसा के क्या फर्क है? समझना समझाना बहूत मुश्किल है। मेरी दादी यहाँ आती हैं तो हम रोज ही पागल हो जाते हैं, मच्छर नही मारने देती, और तो और खिडकियाँ खोल देती हैं "भाग जा लो भगवान जी, ना त ई तहरा के मार दिह स" भाग जाओ भगवान जी वरना ये तुमको मार देंगी, उल्टे होता ये है कि अंदर के मच्छर बाहर तो जाते नही कुछ और आ जाते हैं, और हम हँसते है कि ईया भगवान जी के हमनी के हाथे वैकुंठ जाये के मन करत बा, भगवान जी को हमारे हाथ वैकुंठ जाने का मन कर रहा है।
और आजकल तो जबसे मच्छरो को मारने का रैकेट आया है, अपने हाथो से मार देते हैं, मेरी दादी को मच्छरो को को भी मारना अपराध बोध से ग्रसित कर देता था.. वो उदास हो जाती थी... और आज तक मुझे उदासी नही आयी। और वहीं उनके कई ऐसे काम होते हैं, जिनसे हमको अपराधबोध लगता है पर, उन्हे लगता है कि ये समाज की माँग है खैर।
ज्ञानदत्त जी पुछते हैं कि "हत्या का अपराधबोध किस स्तर से शुरू होत है" ?
इसका जवाब बहूत ही मुश्किल है, मेरा एक दोस्त जो हाल ही मे किसी मुजरिम को पकड के आया था, वो बता रहा था कि जिस मुजरिम को पकडा गया है, वो अभी मात्र १८ साल का है और उसने ३ लोगो को आराम से मार दिया, पूछताछ पर बताया उसने कि उसने सिर्फ़ ये देखने के बाद मारा कि मारने के बाद कैसा लगता है?
मेरा दोस्त बहूत उदास होकर बता रहा था कि गरिमा उसके चेहरे पर थोडा भी गम नही था, वो लडका बडे आराम से अपना किस्सा सुना रहा था, वो बहूत रोमांचित था.....
उस लडके को अंत तक अपराध बोध नही हूआ! क्यों?
ओशो कहते हैं "जो काम आपको आपके दिल को सुकून पहुँचाये सो शुभ है, और जो काम आपके सुकून मे बाधक है, वो अशुभ है" पर अब इस लडके के बारे मे क्या कहते ओशो?
जिसने ३ लोगो को सिर्फ़ रोमांच के लिये बेरहमी से मार डाला और उसे बहूत मजा आया.. क्या यह भी शुभ था?
मेरे सहेली के दादा जी, उनको भी मेरी दादी की तरह मच्छर मक्खी मारने से परहेज है, पर किसी को कैसे रूलाते हैं? उनसे अच्छा भला कौन जान सकता है? क्या किसी के आँसू को देखकर उनके दिल मे सूकुन मिलता होगा? और अगर हाँ तो कैसे?
"मुनि अहिंसा को मुंह पर सफेद पट्टी बांध एक एक्स्ट्रीम पर ले जाते हैं। मुन्ना बजरंगी या अल केपोने जैसे शार्प शूटर उसे दूसरे एक्स्ट्रीम पर। सामान्य स्तर क्या है?" ज्ञानदत्त जी कहते हैं।
बिल्कुल सही बोलते हैं। दोनो ही एक्स्ट्रीम पर हैं, और इसलिये दोनो ही अशुभ हैं? क्योंकि दोनो ने ही जीवन से अपना मूँह मोड लिया है, एक जीव को इतना बचा रहा है कि अच्छे बूरे का फ़र्क ही भूल गया, कोई विषैला हो सकता है, जन जाति को परेशान कर सकता है, इस बात से उनको कोई फ़र्क नही पडता। वो भी एक तरह से विनाश के कगार पर खडे हैं। ठीक कुछ ऐसे की पूलिस चोर को बोल रहा है कि मै आँखे बन्द कर लेता हूँ तुम चोरी कर लो!!!
दुसरा लोगो का अपने हाथो ही विनाश कर रहा है।
अन्तर क्या है दोनो मे? मुझे तो कुछ नही लगता।
अब "सामान्य स्तर की बात" ओशो कहते हैं कि ये जीवन बीणा के तार की तरह है, जैसे की बीणा का तार अगर बहूत ढीला हो तो भी स्वर लहरी नही निकलेगी, और कडक होने पर भी नही।
स्वर निकलने के लिये तार का सही समन्वय होना जरूरी है। खैर मै बीणा के बारे मे नही जानती, पर इतना समझ मे आ रहा है कि उन्होने जो कहा वो एकदम सही कहा, मेरे चाचा जी ढोलक के ताल को ठीक करने के लिये पेंच को बारबार सही स्थिती मे ले जाते थे।
अब मै अपने शब्दो मे कहूँ तो शुभ वो है जिससे किसी का जीना आसान हो जाये और खूद को भी तकलीफ ना हो, और अशुभ वो है जिसके कारण कई लोग तकलीफ मे आ जायें।
यह परिभाषा मुझे सही लगती है।
मच्छर को मारना अपने मजबूरी है, नही मारेंगे तो वो हमे मार डालेंगे, आतंकवादी को मारना मजबूरी है, नही मारो तो हमे मार डालेंगे।
पर किसी ऐसे शक्स के आँखो मे आँसू भर ला देना, जिससे समाज कोई खतरा नही है, वो अशुभ है, भले वो इंसान पागल ही क्यों ना हो?
किसी ऐसे का मजाक बना देना जो आप पर पलटवार करने के मे नाकाबिल हो, और वो दूखी हो जाये अशूभ है।
अपने बच्चो को खिलाने के लिये किसी और का पेट काटना अशुभ है, पर किसी ऐसे का पैसा ले लेना, जिसके कुत्ते भी राजाओ की जिन्दगी बिता रहे हैं, पूरी तरह शुभ है।
ये मेरा अपना मानना है। मुझे आज भी याद है, स्कुल मे मै दादा के नाम से जानी जाती थी, जबकि मैने कभी किसी पर गलत आरोप नही लगाया, पर हाँ उन प्रत्येक हाथो को रोकने की कोशिश की जो बेमतलब किसी का गिराहबान पकडने के लिये आतूर होते थे। मै अपनी तारीफ़ नही कर रही हूँ, बस अपने विचार व्यक्त कर रही हूँ।
मुझे हमेशा से लगता आया है कि मेरा एक झुठ अगर किसी को हँसा सकता है, नयी जान दे सकता है तो वो पूर्णतया शूभ है, और ऐसा कोई सच जो किसी को तकलीफ दे सकता है वो अशूभ है।
इस बारे मे मै हमेशा प्रैक्टिकल रही हूँ। फ़िर भी कभी कभी ये सवाल परेशान करता है कि क्या आजतक जो किया वो सही किया?
पिछले दिनो मै एक सहेली से मिली, उसकी शादी हो गयी है, पति भी साथ मे ही थे, वो बोलने लगी गरिमा ये जो हैं ना बिल्कुल तुम्हारी तरह हैं, बेमतलब का दूसरो के लिये झगडा मोल लेते हैं, उस समय तो मै कुछ नही बोली.. पर मेरे दिमाग मे चल रहा थ... क्या आजतक जो मै करती आयी हूँ, वो सब बेमलब था?
मेरी उस सहेली के लिये भी मैने कई बार लोगो से झगडा मोल लिया था... तो क्या वो भी उसके नजर मे बेमतलब का था? सवाल जब गहरायें तो मुझे आखिरकार उससे पूछना ही पडा.. वो बिल्कुल सकपका गयी.. आप समझिये उसकी सकपकाहट मेरे सवाल के लिये नही था, बल्कि इसलिये था कि कही उसके पतिदेव के सामने ये बात ना खूल जाये कि आखिर वो झगडे मैने क्यों किये थे?
खैर उसकी दशा मै समझ गयी और चूप हो गयी... और मेरे मन एक अजीब सी शांति छायी कि नही मैने सब अच्छे काम ही किये हैं और आज फ़िर से किया.. और यही शुभ है.. अगर मेरी किसी बात से उसके जिन्दगी मे कोई अनबन आ जाता तो वो अशूभ होता.... अभी इसपर सोचने को बहूत है... पर अब वक्त इजाजत माँग रहा है... मै इस विषय पर एक बार फिर से जरूर लिखूँगी तब तक आप भी अपने अपने विचार जरूर रखियेगा।
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