गुरुवार, 27 मार्च, 2008

चलो थोडा बच्चा बन ले।

छ्बी बडो को नमछ्काल।
मेला नाम गलिमा ऐ औल मै तीन छाल की छोटी बच्ची ऊँ।
मुजको ना अछ्क्लीम बोत पछंद ऐ...तो मैने छोचा कि मै ऐछा का कलूँ कि ढेल छाली अछ्क्लीम एक छाथ मिल जाये... तो उछे मै लोज लोज का छकूँ।
तो मेने बली गलिमा को बोला कि अपने दोछ्तो छे मेले लिये अछ्क्लीम माँद ले... लेकिन छबछे एक एक कलके अछ्क्लीम मांदना बली मुछ्किल ता ताम ऐ, तो मेने छोचा कि छबको एक छाथ कबल कल देते हैं।
इछईये मे पोछ्ट ईख अई ऊँ।
मेले को छबी लोग एक एक अछ्क्लीम बेज देना, उछ्को मे लोज लोज खाऊँदी... औल मे अच्छे बच्चे की तलह पल्हाई बी कलूँगी... औल मे तबी तबी थोली छी छलालत बी कल लूँदी... औल मे ज्यादा बमाछी नई कलूँदी.. बछ थोली छी कल लूँगी।
थोली छी बमाछी तो कल छ्कते ऐ ना... कूँ कि छोटी ऊँ, तो मुजे इत्ती छुत तो मित्ती ऐ ना... वैछे बी बच्चे बलो कि तलह थोली ना बमाछी कलते ऐं... ना ही वो बलो कि तलह लते ऐं... वो तो बछ थोले से छमय मे खुछ ओ जाते ऐं।
मै बी ऐछी ई ऊँ.. कबी थोला छा गुछ्छा कलके फ़िल ताली बदा के किलकारी दे के अछने अगती हूँ... औल मै जदी छे छाला गुछ्छा भू के छबके छाथ खेने भी अगती हूं।
पल ऊ का है कि.. कुछ ओगो को अम बच्चो कि बाते छमझ मे ही नही आता... उन्को अगता ऐ कि.. अमे जदी से बआ ओ जाना चाईये.. ताकि हम बी बओ कि तलह.. जुठ, छच.. छ्ल कपत को छमज छके... अमाले बचपन को कतम कलके.. लोग अमे बला बनाना चाते ऐ.. आप कुद ई चोचो.. अम बच्चे नई रहेंगे तो.. आपको अपन बच्पन किधल मिएगा.. ओ खुछी अछ्क्लीम काते ऊए मित्ती ऐ.. वो किधल दिकेगी... जो कुछी प्याल कके मित्ती ऐ.. वो बी नई मियेगी... इछिये आप भी बलप्पन छोल के आओ थोले देल के लिये... औल च के अक्लीम काते ऐं। औल.... औल.. मे बाद मे बताऊँदी नई तो मेली अछ्क्लीम पिदल जायेदी।

बुधवार, 20 फ़रवरी, 2008

हाँ कुछ तो पढ़ा

चलते चलते अनुराधा जी बोली ये पढा ? लिंक देकर तो वो गायब हो गयीं, मैने अनमने भाव से पढ़ना शुरु किया, माफ किजिये अनमना इसलिये कहा कि पढ़ने जैसा मन नही हो रहा था, फिर भी पढ़ना शुरु किया।
सुजाता जी ने अपने पोस्ट मे दो लिंक दिये हैं, उनके साथ आगे बढ़ गयी, और कुछ ही देर मे विचारो के लहर बनने बिगड़ने लगे।
अभी मुझे ठीक से समझ मे नही आ रहा है कि मैने क्या पढ़ा... और पढ़ा तो क्या पढ़ा? या जिसने लिखा लिखते वक्त उसके दिमाग मे क्या चल रहा होगा?
मैने जिस मनोदशा मे पढ़ा क्या वो स्थिती लेखिका के मनोदशा से तालमेल बिठा पा रहे हैं? इन सवालो के जवाब मे उलझ गयी हूँ।
अब बात ये रही कि, अगर मै ऐसी ही उलझी हो तो लिखने क्यूँ बैठी? और लिखा भी तो सिर्फ डायरी एक पन्ने मे रहने देती... जरूरत क्या है जग जाहिर करने की? इसका जवाब भी नही है मेरे पास।
खैर, मै जो सोच रही हूँ वो कि, "मै" जो कुछ हूँ, उसका मुल्यांकन अगर "मै अपने तरीके से नही कर सकती तो, मेरे होने का मतलब ही क्या है?
"मेरे" होने का सार्थक मतलब तो तभी निकल पायेगा, जब मै खुद को जान सकूंगी, लेकिन शायद समाजिक लोगो को यह बात पसन्द नही, उन्हे "मेरे" होनेपन के अस्तित्व का बोध होने से खतरा है, या खुद "मै" मेरे होनेपन की स्थिती को स्वीकार करने से घबड़ाती हूँ।
कल शाम पड़ोसी अंकल से ऐसे बात हो रही थी, बात ही बात मे वो अपने आपको सम्पूर्ण सामाजिक बताने के कोशिश मे लगे थे, उनके साथ उनकी सहधर्मिणी भी थी।
वो दोनो बता रहे थे, सामाजिक होना कितना मेहनत का, चातुर्य का, और सम्बल का काम है, ये हर किसी के बस की बात नही है, वगैरह वगैरह।
मैने उनसे पुछा कि" ऐसे मे आप अपने लिये, अपनी सोच के लिये वक्त निकाल पाते हैं?" क्या आप अपने ही अन्दर के भावो को समझ पाते हैं?" या आप अपने अपनो को, अपने बीवी बच्चो के मनोभाव समझ पाते हैं?"
इसके जवाब मे वो बोले, समझना क्या है, ये तो मेरे अपने हैं, ये तो मेरी हर बात मान ही लेंगे।
बात यह सोचने कि है, जो इंसान खुदको नही समझ पाया,वो समाजिक कैसे बनेगा? वहाँ तो बात और गम्भीर है, वहाँ तो ना जाने कई अस्तित्व हैं, जो खुद भी खुद को नही जानते, उन्हे कैसे किसी नियम मे बान्धा जा सकता है? य कुछ समझाया जा सकता है?
सीधी सी बात है, रोशनी देने के लिये, या किसी के घर का दीया जलाने के लिये अपने घर जलता दीया चाहिये ही चाहिये, इसके बिना काम नही हो सकता।
हमारी स्थिती भी कुछ ऐसी ही है, हम खुद अपनी स्थिती से या तो नावाकिफ हैं, या जानते हूए भी उसे ना जानने का ढोंग करते हैं, जैसा कि मनीषा जी कहती हैं कि "दादी के पैमाने ज्‍यादा संकुचित थे, मां के उनसे थोड़ा उदार और हॉस्‍टल के सहेलियों के थोड़ा और उदार। लेकिन पतित सभी की नजरों में रही हूं। जैसेकि शीशे के सामने चार बार खड़ी हो गई, या कोई रोमांटिक गाना गुनगुनाया, थोड़ा ज्‍यादा नैन मटका लिए, चलते समय पैरों से ज्‍यादा तेज आवाज आई, भाइयों के सामने बिना दुपट्टा हंसी-ठट्ठा किया तो दादी को मेरे अच्‍छी लड़की न होने पर भविष्‍य में ससुराल में होने वाली समस्‍याओं की चिंता सताए जाती थी।

यह समस्या एक अकेली मनीषा जी कि नही, लगभग हर लड़की की रही होगी, और मै यकिन के साथ कह सकती हूँ कि दादी के साथ भी रही होगी, इसके बावजुद दादी समझ नही पायी और सामाजिक बनते हूए, अपनी पोती को समाजिक बनाने के प्रयत्न मे लगी रहती हैं।
मेरी दादी अक्सर मुझे बताया करती थी कि उन्हे अमरूद खाना बहुत पसन्द है, इसलिये वो हमेशा चाहती कि माँ उन्हे थोड़ा ज्यादा दे दे, लेकिन ऐसा हो नही पाता था, अक्सर भाईयो को बड़ा हिस्सा मिलता, जिन्हे वो कुतर कुतर कर फेंक देते, इस तरह के कई किस्से वो बताती थी और उस वक्त मै उनकी आँखो मे वो नज़ारे देख सकती थी।
लेकिन इसके बावजुद दादी बेटे, बेटी के सीमा रेखा को पाट नही सकी और ना ही पोते-पोती की सीमा रेखा को, मै कभी कभी इसपर उनसे पुछा करती थी कि दादी आपको नही लगता, कि आप कुछ कमी कर रही हैं, तो उनका जवाब होता था, क्या करूँ समाज का यही दस्तुर है।
मुझे यह जवाब कभी पसन्द नही आया, आखिर ये कैसा दस्तुर है? जो खुद को ही समझ से परे रखने पर मजबुर करता है, जो खुद को भूलजाने पर मजबुर करता है। लोग कहते हैं "बीती ताहि बिसारि दे, आगे की सुधि लेहूँ" अर्रे बीती को भुलने से काम नही चलेगा, उसे अपने पास धरोहर की तरह रखना चाहिये, ताकि आगे वो पिछला अनुभव काम आये।
हमारे समाज मे यही गड़बड़ है... हम अपने उन कटु अनुभवो को याद करके रोते तो हैं, पर आगे ऐसा ना हो इसका प्रयत्न नही करते।
हम "मै" कि खोज मे रहते हैं, पर एक तरफ समाज के बीच उस "मै" से किनारा कर लेते हैं।
विशेषकर यह बात लड़कियो के लिये लागु होती है, एक पीढ़ी दुसरी पीढ़ी को अपने "मै" के खोज मे आगे नही बढ़ने नही देती, उन्हे हमेशा ना जाने किस समाज का भय खाये रहता है, वो भूल जाती हैं कि, जिस समाज मे "मै"(अस्तित्व) ना हो उसके साथ जीना ही कितना आधारविहीन है, और फिर कोई "मै" इस समाज को मानने से इंकार कर देता है तो उसे आसामाजिक तत्व का तगमा दे दिया जाता है या पतित कह दिया जाता है।

हाँ पर मुझे कहना पड़ेगा तुम्हारी नज़र मे मै पतित ही सही, पर मैने आज जब अपने अस्तित्व को पहचाना है तो मुझे तुमसी बनने की चाहत भी नही रही, बैठी रहो किसी के लिये सामाजिक बनने कि चाहत मे, "मै तो" आज खुद के लिये जीना चाहती हूँ।
ताकि आज मै कह सकूँ कि "हाँ यह जो मै हूँ वो किसी समाज की धरोहर नही, बल्कि मै खुद एक नये समाज के सृजन मे प्रयत्नरत हूँ, मै वो अस्तित्व हूँ, जो मुझसी होकर जीना चाहती हूँ, इस गगन को अपने पंखो से नापना चाहती हूँ, इस दुनिय को अपने रस्मो-कवायदो के अनुसार देखना चाहती हूँ, मेरे अन्दर किसी और सी बनने की ललक नही है, ना हि मै चाहूँगी कि "तुम" मुझसी बनी, "तुम"भी तो एक अस्तित्व हो मेरी तरह ही, जाओ तुम भी अपनी एक दुनिया बनाओ।"


बुधवार, 23 जनवरी, 2008

भारत रत्न के सच्चे हकदार

जब दलाल बन गया हलाल स्ट्रीट तो सभी लोग अपने अपने शेयर बेचने मे लगे थे, हालात देखकर ऐसा लग रहा था कि सभी लोग जब बेचने मे लगे हैं, मार्केट सुधरेगा कैसे?
कोई तो खरीददार भी होना चाहिए? ऐसी हालत मे जीतू भाई और मै खरीदने मे लगे थे, हो सकता है हमारे ही खरीदने से मार्केट सुधरा हो... :D

ऐसे मे भारत रत्न के असली हकदार तो हम हूये ने, जाने और कितने लोग हलाल होते और हमने बचा लिया :)



गुरुवार, 25 अक्‍तूबर, 2007

गाव के कुछ मजेदार किसे

बहुत दिन से हम कुछुओ नईखी लिखले, आज सागर भईया, बोलनी हा कि व्यंग लिख... त हम ई सोचनी हा कि ठीक बाती बा, हम्हु व्यन्गो के अजमाई लेतानी, का जाने की लिखे आईये जाऊँ,लेकिन ई बाती बा की, हमरा आजु ले ना बुझाईल की ई आखिर व्यंग होला का?काहे कि कौनु कौनु बतिया प जब कुल्हिये लोग हँसेला हमरा हँसिये ना आवेला, अरू कौनु कौनु बतिया प हमरा अतना हँसी आवेला अवरू केहुके आईबे ना करेला।अब ई बाती से हम बड़ी मुश्किल मे पड़ी गईल बानी कि आखिर ई व्यंग होला का? अब ई केहु समझाई दी ही तबे नु हमहूँ व्यंग लिखबी, तबले हम एगो मजेदार किसा बता देत बानी...का जाने कि इहे व्यंग होखे...

हाँ कुछु कहे के पहिले ईहो बता देत बानी की, ई किसा हम कबो अपना आँखिन नईखी देखले, बस सुनल सुनावल बतिया हटे-

हमरा बलिया जिला मे एगो गाँव बा, ओकर नाम ह मझऊँआ गाँव, ओजुगा के बारे मे किसा ह कि,
एक हाली, एगो भईस एगो कूँआ मे गिरी गईली, अब गाँव के लोग का कईल कि, घासी बटोर के, भईसिया के देखावे लागल...

चु चु... आ जा... अर्रे आ जा ना....

लेकिन भईसिया ना आईल... गऊआ के लोगवा के सामने ही भईसिया डूबी गईल... अरू गऊँवा के लोग कहे लागल कि, लागत रहल हा कि... बुझात रहल हा कि भईसिया के ढ़ेरे पियासी लागी गई रहल हा... एसे ऊ खाना खाये ना आके पानी पिये चली गईली हा..... ।


:D

अभी ई किसा निमन लागि तो फेरू ऐसन एगो किसा ले के आईबी...:)

रविवार, 5 अगस्त, 2007

मित्रता दिवस




गुरुवार, 2 अगस्त, 2007

प्यार इश्क और मुहब्बत

प्यार इश्क मुहब्बत...कई लोगो को यह सुनते ही बदन मे झुरहुरी सी पैदा होने लगती है, तो कुछ लोग दर्द मे डुब जाते है, कितनो के लिये यह कड़ा इम्तेहान है, और कुछ लोग इससे नज़र बचाकर निकल जाने मे ही भलाई समझते हैं।
आज अपने एक दोस्त से बात कर रही थी, हमारी बात मजाक से शुरू हुई, उस व्यक्तव्य के साथ और दोस्तो के विचार भी मिलते गये, और हम हँसते हँसते ना जाने कहाँ तक पहुँच गये।
बात किस मोड़ निकली और कहा गयी, यह जानना उतना जरूरी नही है, लेकिन मुझे अपनी बात शुरू करने के पहले अपने उन दोस्तो को धन्यवाद कहना उचित लग रहा है जिनके कारण बात सकरात्मक मोड़ तक आयी।

अब मुद्दे पर आती हूँ।
जी बात कर रही हूँ प्यार की... आखिर होता क्या है प्यार.. सिर्फ किसी को देखा, प्रारम्भिक बात चीत हुई, और कुछ लगा कि हाँ उसके मन मे मेरे प्रति कुछ है, और इजहारे इश्क कर दिया!
तभी पता चलता है कि अर्रे रे रे ऐसा तो कुछ था ही नही, फिर दिल टुट गया, सार कुसुर सामने वाले को दे दिया...
या किसी से आपकी दोस्ती हूई आपके अच्छे बुरे वक्त मे उसने आपका साथ दे दिया, आपसे दोस्ती निभाई और आपने उसे प्यार का नाम दे दिया... उसके कहने पर कि यह सिर्फ दोस्त होने के नाते कहा था... आपके दिल को बहुत चोट आ गयी.. आखिर क्युँ ना आये.. आपको उससे प्यार जो हो गया था!!!
अपने दोस्त को कुछ भी कहने से पहले ध्यान दिजियेगा... आपके दोस्त ने दोस्ती निभाई, आपको गलतफहमी हुई उसमे उसकी क्या गलती...

मै मुद्दे से भटक ना जाऊ इसलिये इसे यही छोड़कर आगे चलती हूँ
या प्यार यह होता है कि एक साथ जीने मरने की कसमे तो खा ली, लेकिन जब साथ जीने मरने का वक्त आ गया तो समाज के डर, माँ बाप के कारण बीच मझधार मे ही साथ छोड़कर चले गये.... और उम्र भर अपने किस्मत पर रोते रहे....
या फिर अपने प्यार के खातिर सबकुछ छोड़कर निकल आये... लेकिन वक्त जब अपने साथी के साथ देने का आया, घरवालो पर कोई मुसीबत आयी तो आराम से कह दिया.. मै ऐसा नही चाहता था/चाहती थी। यह तो बस इनके कहने मे आकर अपने घरवालो को भूल गये।
यह तो हुआ दो जोड़ो के बीच मे पनपने वाले प्यार की बात... (मुझे कभी नही हुआ इसलिये कोई तजुर्बा नही है, कही गलत बोला हो तो माफी चाहती हूँ)
अब आगे मै जिस प्यार के बारे मे बात करना चाहती हूँ, वह है प्राणी मात्र के दिल मे पलने वाला प्यार।
वह प्यार जो हरेक शख्स के दिल मे अपने लिये, अपने वतन के लिये, अपने घर वालो के लिये, अपने दोस्तो के लिये पलता है, वक्त के साथ बढ़ता है, और इसका अंत हमारी ही बेवकूफी के कारण हो जाता है।
हम सब एक दुसरे को किसी ना किसी निगाह से चाहते हैं, पसन्द करते हैं, पर कह नही पाते... ऐसा क्यूँ?
मेरे एक दोस्त ने कहा कि.. आज के जमाने मे यह शब्द बहुत खतरनाक साबित हो सकता है, बहुत सोच सम्भल के इसका इस्तेमाल करना चाहिये!!
सोच सम्भल के!!! हाँ सच हमने अपने आप को इतना सम्भाल लिया है कि.. दोस्त अपने दोस्त से अपने प्यार का इजहार नही कर सकता... क्या दोस्तो के बीच प्यार नही होता, दुश्मनी होती है?
अपने भारत आम तौर पर कोई माँ-बाप अपने बच्चे से अपने प्यार का इजहार नही करते!!!
भाई बहन से नही करते!!!
आप देख लिजिये फिल्मो मे जितने भी दिल-विल, प्यार-मुहब्बत पर गाने बाने हैं, वो सब सिर्फ दो आशिको को दर्शाते हैं
क्या प्यार इतना संकुचित हो चुका है?
प्यार जिसके आधार पर सारी दुनिया बनी है, जिसकी बुनियाद पर ही कोई रिश्ता कायम रह सकता है... वो इतना अधुरा... इतना खोखला !!!
अपने आप से पुछना पड़ेगा? यहाँ जो वरिष्ठ लोग हैं... वो अपने दिल से पुछे.. क्या अपने बच्चो से आप प्यार नही करते? अगर करते हैं, तो कहने मे कैसी झिझक है?
युवा वर्ग अपने आप से पुछे वो अपने माँ-बाप से प्यार नही करते? फिर शर्म कैसी?
आज तक आप अपने प्यार का इजहार क्यो नही कर सके....?
मेरे दोस्त के अनुसार यह बहुत गम्भीर समस्या है, शायद हम लोगो मे से बहुतो के लिये यह एक गम्भीर समस्या है... पर.. इतना भी जटिल नही...
बस एक शब्द, आपके अपनो की जिन्दगी मे बहार ला सकने मे सक्षम है... शायद हमने इस बात को महसुस नही किया... पर जरूरत है कि अब इस बात हम समझे... और अपनो के लिये अपने प्यार को प्रदर्शित करें।
बहुत लोग यह तर्क देते है कि प्यार को इजहार करने की जरूरत नही... अ र्रे यह तर्क अपने प्रेमिका पर फिट नही बैथता, बाकि हर रिश्ते पर फिट बैठता हैं, आखिर क्युँ?
यही नही कुछ लोग तो अपनी बीवी से भी अपने प्यार का इजहार नही करते, और जब रिश्तो मे दरार पड़ने लगती है तो सार कुसुर उसी को दे देते हैं।
इतना संकोच......!!!
अब जरूरत है नये पहल की... आगे बढ़ें और प्यार को संकुचित दायरे से निकालकर, उसके कण कण मे खुद को डुबायें।
अपने प्यार को सही तरीके से समझे, जाने और उसे अपने जिन्दगी मे उतारे... तभी जिन्दगी प्यार से भरी-पूरी और खुशहाल बनेगी...
कहिये आपका क्या कहना है!!!

मंगलवार, 17 जुलाई, 2007

"मै भी कुछ लाऊँ" - 2

पिछली पोस्ट मै भी कुछ लाऊँ मे अधुरी कलेक्शन रह गयी थी, आज इसे पुरा करने के कोशिश मे हूँ, मेरी आधी अधुरी कलेक्शन और बक बक को बर्दाश्त करने के लिये, सागर भईया, जोशी भईया (जो कि मेरे बक बक के आदी हो चुके हैं), सुनीता जी, समीर जी, Divine_India, अनुप जी, और काकेश जी का दिल से शुक्रिया करती हूँ, और आगे भी आप मेरी बकबक और कलेक्शन को बर्दाश्त करेंगे ऐसा निवेदन कर रही हूँ।





ये रहे पिरमिड्स जो कि मै चिकित्सा के दौरान उपयोग मे लाती हूँ, वैसे ये जरूरत के हिसाब से कई रंगो मे बनवाना होता है।

बाजार मे कयी तरह के रंग बिरंगे और तरह तरग के धातु कृस्टल के पिरमीड आराम से मिल जाते हैं, पर मुझे यह खुद के बनवाये प्लाई के पिरमिड ही पसन्द है, क्योकि मै इन्हे अपने हिसाब ऊर्जांवित कर सकती हूँ।

जीवन ऊर्जा पर पिरामीड थेरेपी जिन्होने पढ़ा होगा वो इसके महत्व को अच्छी तरह से समझ जायेंगे।


मुख्यतः पीले, नीले, सफेद, गुलाबी और हरे रंग के पिरामीड ज्यादा चलन मे होते है।



ये हैं जिरकॉन, पिछले पोस्ट मै भी कुछ लाऊँ पर गोल्डेन जिरकॉन का जिक्र किया था मैने... इस बार अलग अलग फोटु डालने से बचने के लिये एक साथ सभी को इक्ट्ठा कर लेना ज्यादा अच्छा लगा। ( फोटु मे रंग कुछ अजीब से आये है, मैने बहुत कोशिश की अच्छे से लेने के लिये पर ये जैसे के तैसे ही रहे)


सबसे ऊपर हरा जिरकॉन, यह भाग्योदय, पैसे के लिये भी पहना जाता है, चिकित्सा क्षेत्र मे इसका उपयोग सावधानी से किया जाना चाहिये, वरना चिकित्सक की एक गलती मरीज के लिये भारी पड़ सकती है, हरे रंग की मानसिक किरणे सभी मरीजो पर अच्छा प्रभाव नही डालती इसलिये सोच विचार कर ही इसका उपयोग करें, वैसे कुछ बिमारीयों मे इसका अपना महत्व है।


फिर बारी है काले हकीक की, चुँकि जिरकॉन काले रंग मे आता ही नही है, इसलिये यहाँ हकीक से ही काम चलाना पड़ता है, काला रंग यह किसी चिकित्सा मे काम नही आता है बल्कि, चिकित्सा के दौरान पैदा हूई नकरात्मक प्रभाव को अपने अन्दर अवशोषित करता है, इसका विशेष उपयोग कैंसर जैसी भयानक बिमारियों के चिकित्सा के समय होता है।

बैंगनी रंग का अपना कोई खास महत्व नही होता बल्कि यह अन्य रंगो के साथ मिलकर काम करता है। पर यह अपना पुरा सहयोग देता है, जिसे नजर-अन्दाज करना पागलपन ही होगा।


तत्पश्चात नीला जिरकॉन, यह अपने आपमे सात्विक धारा को प्रवाहित करता है। दिमाग स्थिर रखता है, नकरातमक भावनाओ को मिटाता है, और चिकित्सा क्षेत्र मे तो इसके बिना कुछ हो ही नही सकता है, बिमारी कोई भी हो, नीला जिरकॉन जरूर दिया जाता है।


उसके बाद है गुलाबी जिरकॉन, गुलाबी रग के प्रभाव से कौन परिचित नही है, मेरा अपना प्रयोग है कि दो लोगो को एक ही तरंग से ऊर्जांवित किया हुआ गुलाबी जिरकॉन पहनाया जाय, उनमे आपस मे होने वाले द्वेष को आराम से कम करते हुए क्रमशः मिटाया जा सकता है।

वैसे दिमागी संतुलन के वक्त यह काम मे आता है।


सफेद जिरकॉन यह तो साधरणतया दुसरे रंगो के साथ मे दिया जाता है, जैसे कि अगर किसी शक्स को गोल्डेन हीलीग चल रही है, और उसके कारण उष्मा की मात्रा बढ रही हो तो उसे सफेद जिरकॉन दिया जाता है।
यह शांति का भी प्रतीक है, उग्र स्वभाव वाले व्यक्ति को भी श्वेत चिकित्सा देते हैं, औरा बैलेंसिंग मे भी श्वेत जिरकॉन का अपना महत्व है, वैसे कई हीलर्स ऐसा मानते हैं कि सफेद रंग का उपयोग नही करना चाहिये, पर मै पिछले कई सालो से सफेद जिरकॉन को प्रयोग मे ला रही हूँ, और मुझे इसका कोई दुष्प्रभाव नही दिखा, बल्कि कई परेशानियों का समाधान इसके बिना मुश्किल ही नही नामुमकिन हो जाता है।


फिर लाल जिरकॉन चिर परिचित अन्दाज मे, यह शक्ति को सम्बोधित करते हैं, जो इंसान अपनी सहज भावुकता से परेशान होते हैं इसका उपयोग कर सकते हैं, चिकित्सा के क्षेत्र मे इसकी भुमिका अलग अन्दाज मे है, जिस किसी बिमारी मे रक्तवर्णी चिकित्सा दी जाने वाली हो, इसे सबसे ऊपर रखते हैं।


और बीच मे आपका जाना पहचान गोल्डेन जिरकॉन जिसके बारे मे पहले ही बता दिया था :)
इनके बाद भी कई रंगो का समावेश होता है, पर यह रंग सबसे ज्यादा उपयोग मे होते है। जिरकॉन इसलिये क्योकि यह लगभग हर रंग का मिलता है, और बाकी कृस्टल्स की अपेक्षा सस्ता भी है।


विशेष- अगर कोई शक्स यह सारे रंग या औरा रीडर की मदद से अपने लिये रंगो का चुनाव करवा के ऊर्जांवित जिरकॉन अपने साथ रखे तो आने वाली कई परेशानियों से निजात मिल सकता है, पर ध्यान रहे कि कलर थेरेपी का प्रयोग अपने क्षेत्र मे मास्टर हुए चिकित्सक ही कर सकते है, चाहे वह अल्फा के हों, रेकी के, या कोई भी अन्य ऊर्जा चिकित्सक, इसलिये किसी मास्टर से ही सलाह लें।






ये है हकीक, युँ तो इनका भी वही काम है जो जिरकाँन करते हैं, पर कई लोग हकीक लेना पसन्द करतें हैं, किस कारण से, ये मुझे नही पता, सबकी अपनी अपनी दलील होती है, मैने कभी कारण जानने कि कोशिश नही की, किसी को पता हो तो अवगत करा दें :)


वैसे एक राज की बात बताऊँ तो.. अगर जिरकॉन को 8th डिग्री ऊर्जा से ऊर्जांवित किया जाये तो यह उस रंग से सबन्धित नवग्रहो पर भी काम करते हैं, मतलब की.. इन्ही से महंगे रत्नो का लाभ भी पाया जा सकता है, बशर्ते की 8th डिग्री ऊर्जा से ऊर्जांवित किया जाये। :)









खि खि.... यह क्या है.. वैसे तो मै इसको बाजार से जब लायी थी तब मुझे भी नही पता था कि कभी इसे इस तरह भी प्रयोग मे लाऊँगी, मुझे तो बस यह अच्छा लगा था।


महीने भर पहले मैने इस पर प्रयोग किया... पहले तो कुछ समझ मे नही आया, पर बाद मे यह मजेदार काम करने लगा, मैने जिस कमरे मे इसे रखा है उसमे शांति मिलती है, फिर देखने के लिये कुछ दोस्तो को यह गिफ्ट कर दिया, उन्होने भी यही बात दुहराई, तो बस तबसे यह मेरे कलेक्शन मे शामिल है।



लो फिर से एक अजुबा.... :P इसकी भी कुछ ऐसे ही कहानी है, पर काम अलग.... यह टुक टुक जनाब (pet name) बिमार दोस्तो को गिफ़्ट करने के लिये ठीक है.... मेर मतलब वो दोस्त जो बिमारी के कारण हताश हो रहे हो, उन पर इसके द्वारा पहुँचा तरंग गज़ब का काम करता है।



वैसे अभी इन दोनो का व्यव्सायिक नामकरण नही किया है, पर कलेक्शन मे आ जाने पर मुझे बेहद खुशी भी है, उम्मीद है कि आपके चेहरे पर भी मुस्कान आ गयी होगी।


अब.. ये क्या है.. यह है नज़र ना लगे यंत्र.. याद होगा टी वी पर बहूत छाया था कुछ दिन ... ही ही... वैसे उससे इसका कोई लेना देना नही है... मुझे इसके बारे मे एक बुढे दादा जी ने बताया था.. बाद मे एक मंत्र को सीख कर इसका उपयोग किया.. वाकई कमाल का है... जो लोग भुत-प्रेत मानते हैं उनके लिये.... मुझसे पुछो तो मानती हूँ, कि हमारे आस पास कई तरह की नकरात्मक किरणे घुमती रहती हैं, जो हमारे दिलो-दिमाग पर गहरा असर डालती हैं, यह सारा खेल उन्ही किरणो से बचने का है, जिसमे अलग अलग वस्तुये मददगार हैं इस श्रृंखला मे विशेष बीज मंत्र से और रक्तवर्णी किरणो से ऊजांवित यह ताबीज बहुत काम आता है।
लगभग मेरा कलेक्शन पुरा हूआ.. कुछ चीजे रह गयी हैं पर उन पर अभी शोध चालु है, सकरात्मक प्रतिक्रिया मिलने के बाद ही उनके बारे मे कुछ बता पाऊँगी।
पिछली पोस्ट पर काकेश जी ने कीमत बताने के लिये कहा था.... तो कहना मुनासिब होगा कि... यह समान तो मै लाती हूँ बजार से... अब मुझे कभी यह स्टॉक महंगा पडता है कभी सस्ता।
इसलिये कीमत मैने रखा है= प्रोड्क्ट+ मेरी फीस + भेजने का खर्चा।
मेरी फीस किसलिये भाई... जब बाजार मे यह चीजे मिल जायेगी... तो कहना पडेगा कि.. बजार मे आपको समान मिलेगा, ऊर्जांवित तो मै ही करूँगी ना (या कोई अन्य मास्टर)।
10 तरह के स्तर होते है, हर स्तर की फीस अलग होती है। आपको कौन से स्तर के हीलींग की जरूरत है, वो आपकी परिस्थिती देख के निश्चित की जाती है।
घबराईये मत कुछ ज्याद पंगा नही है.... साधारणतया लोग 1 महीने के लिये 2 महीने के लिये, या अपने काम के हिसाब से कॉंट्रेक्ट लेते हैं।
विस्तृत जानकारी के लिये सम्पर्क कर सकते हैं :) avgroup at gamil dot com पर।
बहुत हो गया अब इजाजत लेती हूँ, अगली पोस्ट पर मिलेंगे। टाटा