क्यों खोजूं तुझे कहीं और,
क्या तू मुझमे शामिल नहीं है?
किसकी खोज करूं आखिर?
क्या मेरे अस्तित्व में,
तेरा अस्तित्व शामिल नहीं है?
तेरे बिन पूर्णता
आखिर किस कदर होगी?
क्या तेरा ओज़,
हर शय को हासिल नहीं है?
ये प्रश्न भी आता है सामने कि,
गर तू,
मुझमें और सम्पूर्ण जगत में
शामिल है।
तेरा ओज़ हर कण को हासिल है।
फिर वो जो तुझे ढ़ूंढ़ते हैं,
पवित्र दीवारों में
मंत्रों और आज़ानो में
जो बताते हैं हमें,
कि तेरा अस्तित्व शामिल हैं
उनके हरेक व्यख्यानो में।
उनकी नज़रें, दीदार कर सके
हर कण में तेरा अक्स,
वो रोशनी उन्हें क्यों हासिल नहीं है?
खुला आकाश, महकता पवन, खिलखिलाता मौसम... और अचानक कही दर्द, रूठता मौसम, सिमटता जीवन, ये सभी रूप जीवन के ही रूप है, एक दुसरे से अलग पर एक दुसरे के बिना अधूरे
आईए जिन्दगी का स्वागत करें। अहा! ये कहीं से भी ना सोचा जाए कि मैं अपने ब्लॉग के लिए बोल रही हूं, मैं तो बस सीधे सादे शब्दों में जिंदगी के लिए ही बोल रही हूं। जिंदगी जो आपकी है, मेरी है, सम्पूर्ण विश्व की है। जिंदगी जो सृजनात्मक है, जो प्रेम का प्रतीक है। जिंदगी... जो निश्छल है, निर्मल है.... और... बस जिंदगी है... उसका स्वागत करें...
शुक्रवार, 30 सितम्बर 2011
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1 comments:
हर एक में शामिल है वह।
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