शनिवार, 14 फ़रवरी 2009

वैलेनटाईन डे मेरी नज़र से

वैलेनटाइन डे आ गया है... और हवा मे खूब गर्मजोशी है... वाह वाह। गर्मजोशी उन दिलों मे हैं, जो अपने प्यार का पहले-पहल इज़हार करना चाहते हैं, और उनमे भी हैं, जिन्होने कर रखा है बस कोई अच्छा सा गिफ्ट देकर उसे पुख्ता करना चाहते हैं, और उनमे भी है जो इस हंगामे को रोक देने के लिये कुछ भी करने की पूरी तैयारी के साथ हैं। क्या मौसम है... पर जनाब गर्मजोशी वही पर नहीं है जहां होना चाहिये... प्रमाण के तौर पर
पिछले १० दिन से मैने अपने परिचितो की श्रेणी मे ४० साल और इसके ऊपर के सभी दम्पतियों को पूछ लिया कि उन्होंने इस दिन की तैयारी मे क्या किया... जवाब लगभग ऐसा था एक-दो छोड़कर...

अरे बेटा अब इस उम्र मे हम कहां इस दिन को मनायेंगे
अब वो बात कहां
अब तो बस दिन कट रहे हैं
उनको हमारी इतनी फिक्र नही, हम कुछ कह भी दें.. तो... कोई फर्क नही पड़ेगा
श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श ये बातें भी ऐसे खुलेआम की जाती हैं
ये भी कोई दिन है पता ही नही था
अरे ये अंग्रेजों ने तो ......
हद हो गयी... मै सोच रही थी, जिसके साथ ता-उम्र गुजारी है और बाकी की गुजारनी है उससे प्यार नहीं? और अगर है तो इजहार करने मे इतनी झिझक क्यों? क्या प्यार सिर्फ २० की उम्र की धरोहर है जो ४० तक जाते जाते पुरानी पड़ जाती है? जिसे याद करने मे भी शर्म आती है?
मै तो समझती थी कि प्यार अत्यंत ही पवित्र होता है और इसकी पवित्रता वक्त के साथ और गहरी होती जाती है... लेकिन प्यार तो कलंकित, अपमानित, निरूत्तरित है.. चलिये जाने देते हैं, मुझे इसका जवाब चाहिये भी नहीं... मै कुछ और ही सोच रही हूँ। क्योंकि बड़े लोगो के बीच मे बच्चे को नही पड़ना चाहिये इसलिये मै बच्चों मे बीच मे ही पड़ती हूँ।
वैसे बड़े हो या बच्चे प्यार कलंकित, अपमानित होता ही है... पर सवाल उठता है क्यों? क्यों? हमारे देश मे भी प्यार इतना अपमानित हो गया है? प्यार की पवित्रता मिट गयी है/रही है... बचा है तो... प्यार के नाम पर गंदगी, अश्लीलता, बेवफाई और निरूत्तर होता प्यार...

इससे कुछ याद आ रहा है कि कुछ दिनो पहले पड़ोस मे किसी को बेटा पैदा हुआ, कुछ दिनो बाद मै मिलने गयी तो भईया भाभी ने कहा कि बेटा जरा इसका औरा देखना, मैने कहा कि बच्चो के औरा तो कुछ खास नही होते क्योंकि औरा तो मन कि गतिविधियों पर ज्यादा चलता है और बच्चे मे इसकी कमी पायी जाती है.. फिर भी उनकी जिद्द पर यूँ ही थोड़ा चेक किया और जो समझ मे बताया... उन्होने हँसते हुए कहा कि ये बताओ ये सीधा साधा होगा या बदमाश? मैने पूछा कि आपको क्या चाहिये? उन्होने कहा कि मुझे तो बदमाश ही चाहिये सीधे साधे लड़के अच्छे नही लगते... लड़का वही अच्छा लगता है जो १०-१२ गर्ल फ्रेन्ड पटाये, मार पीट करे....
वेल, यह उनकी पर्सनल च्वॉइस है.. मै नही कहती कि सभी लोगो की होगी, पर इस बात पर इंकार कौन कर सकता है कि ऐसी च्वॉइस दूसरे किसी की नहीं होगी?
ऐसे परिवेश मे जो लड़का पलेगा वो किस तरह के भविष्य को निरूपित करेगा... कोई भी अच्छे से अंदाजा लगा सकता है। उस लड़के के लिये प्यार महज खिलवाड़ ही होगा और कुछ नहीं...

ऐसी लड़की के लिये भी माँ-बाप की अपनी च्वॉइस होती है... वो सीधी संस्कारी, इत्यादि इत्यादि होनी चाहिये... लड़की जिस परिवेश मे पलती है (अधिकांशतः) प्यार उसके लिये एक हौवे से कम नही होता... घर मे लोग प्यार का नाम तक आने नहीं देते, लड़की अपना कोई अनुभव अपने अभिभावक से बांट नही पाती, इस कंडीशन मे वह बाहर मारी मारी फिरती है/फिरेगी ही... आखिर कहीं ना कहीं उसे कुछ ना कुछ तो चाहिये और ऐसे मे उसे किसी ऐसे लड़के का साथ मिल जाता है... जो लड़की के भावना को महज खिलवाड़ ही समझता है... और जो होता है वो मुझे बताने की जरूरत नही है...

पर इसमे गलती किसकी है? इस तरह के परिवेश मे पले युवक किसी पार्क मे प्यार की पवित्रता को नज़र-अन्दाज़ करते नज़र आ जायें तो इसमे कोई आश्चर्य नही होना चाहिये... खराबी तो नीव मे मिली है उपर से कितना भी लीपा पोती कर लो बात नही बनेगी।

अक्सर मुझसे टीनेज लड़कियाँ मिलती हैं और अपने कुछ अनसुलझे सवालों के जवाब मांगती रहती हैं, सवाल ऐसे कोई भारी भरकम नही होते जिनका जवाब उनके माता पिता नहीं दे सकते... मै अक्सर उनको कहती हूँ कि आप अपने ममा से ही पूछ सकती थी... तो जवाब होता है कि ना दीदी वो तुरन्त मुझे गलत समझ लेती हैं...
पता नहीं, क्या माँ इस दौर से नही गुजरी होंगी? जो बदलाव शारिरिक, मानसिक हारमोनल स्तर के दौर से यह लड़की गुजर रही है... उसकी माँ को भी गुजरना पड़ा होगा और आने वाली प्रत्येक पीढ़ी को गुजरना पड़ेगा... तब माँ बेटी में ऐसा रिश्ता क्यों नहीं बन पाता कि अपनी बेटी को इस नाजुक दौर मे पूरी सहायता दे, उसका पथ प्रदर्शक बने ना कि एक डिक्टेटर बन जायें।
मातृत्व समुदाय मुझे माफ करें पर अधिकांश लड़कियों की माँ यही काम करती हैं... जबकि माँ बेटी का रिश्ता अत्यंत मधुर होना चाहिये... इस रिश्ते पर अगर यूंही डिक्टेटरशिप लगी रही तो प्यार की स्थिती इससे भी कहीं ज्यादा भयावह होगी। यह सोच जब तक नही बदलेगी कि बेटा भी बदमाश नही शरीफ हो, इज्जत करना जाने, प्यार की पवित्रता को पहचाने वह अपने अनुभव अपने अन्दर हो रहे बदलाव को समझे तब तक अच्छे युवक के जन्म लेने का सवाल ही नही उठता, यही बात बेटी के लिये भी लागू होती है। अगर ऐसा नही हुआ तो प्यार का जो अर्थ अनर्थ निकलेगा/निकल रहा है वो शर्म-सार करता ही रहेगा... चाहें कितने भी बन्दिशें लगा दी जायें... जब तक नींव मजबूत ना हो इमारत को तो ढ़हना ही है...
समर्थ, शक्तिशाली, चरित्रवान युवा आसमान से उतर कर नहीं आयेंगे ना ही उनको जबरदस्ती ऐसा बनाया जा सकेगा... उसके लिये शुरूआत करनी पड़ेगी अपने ही घर से... वरना कितने भी दल बन जाये इस अनर्थ के अर्थ को रोक देना किसी के बस का नही हो सकता और जो होगा/हो रहा है उसके जिम्मेदार आप ही होंगे/हैं।
चरित्र कोई घूँटी नहीं हैं जिसे पिला दिया जाये और पीने वाला आत्मसात कर ले। बल्कि चरित्र हनन क्यों हो रहा है इसके कारण को जानकर निवारण की आवश्यकता है... वरना प्रेम दिवस यूँहीं अपमानित होता रहेगा वो भी उस उस देश मे जहाँ राधा कृष्ण की वन्दना की जाती है।
चलिये बहुत हो ली भाषण बाजी अब हम जा रहे हैं... अपने पापा जी को वेलेनटाइन डे विश करने... इसके लिये हमको डंडे नही पड़ने वाले बल्कि बहुत मजा आने वाला है... ये अलग बात है कि पापा जी के अचानक आये बिजनेस टूर के कारण सारे प्लानिंग धरी की धरी रह गयी... पर हम तो रोज रोज वेलेनटाइन डे मनाते हैं, वो भी नये नये अंदाज मे... वो हम आपको फिर कभी बतायेंगे अभी थोड़ी सी ममा पापा जी को तंग करके मजे लेने जा रहे हैं।

1 टिप्पणी:

ज्ञानदत्त । GD Pandey ने कहा…

पीढियों के मध्य एक वेलेण्टाइन सूत्र की तलाश बहुत परिणाम वाली नहीं होती। वहां दूसरे नियम - संस्कार काम आते हैं।