शुक्रवार, 13 अप्रैल 2007

क्या है सुसंगतता?

पिछली पोस्ट हाय रे मैं भुलक्कड कुछ कशमकश के साथ डाली थी, सकरात्मक टिप्पणी देखकर राहत मिली।

आगे कुछ नया लिखूँ उसके पहले खयाल आया कि कुछ दोस्त सुसंगतता के बारे मे नहीं जानते। तो कोई नया मेडिटेशन टिप दूँ उसके पहले जरूरी है कि सुसंगतता का मतलब बताया जाये।

सुसंगतता... अपने नाम के ही अनुरूप है... इस प्रक्रिया के दौरान आपके एनर्जी लेबल को ब्रम्हांडीय एनर्जी लेबल से मैच कराते हैं।
उदाहरण के तौर पर रेकी को लेते हैं... (रेकी इसलिये कि इसे बहूत लोग जानते हैं)। मोटे तौर पर रेकी एक हीलींग पद्धति है, जिसके द्वारा कई मानसिक शारीरिक रोगो का ईलाज सम्भव है।

हां तो बात हो रही थी सुसंगतता की... तो ये प्रमाणिक तथ्य है कि रेकी की शक्ति किरणे हमारे अन्दर और ब्रम्हांड मे पहले से ही विद्यमान है बस हमे उसके बारे मे पता नही होता ना ही हम उसे संचालित कर पाने मे सक्षम होते हैं।
अब सवाल उठता है कि जब हमारे अन्दर ये ताकत मौजूद है तो हमे आभास क्यूँ नहीं और हम इसे संचालित क्यूँ नहीं कर पाते?
मनीषियो ने तो इस कारण को बहूत अच्छे से समझाया है, लेख की लम्बाई कम रखने के मक्सद से मै एक उदाहरण मे स्पष्ट कर रही हूँ, कि जिस प्रकार कस्तूरी मृग अपने ही नाभि मे पल रहे कस्तूरी से अनजान रहता है, ठीक उसी प्रकार हम अपने अन्दर की रेकी से अंजान रहते हैं।
सुसंगत प्रक्रिया मे आपको उक्त एनर्जी लेवल से पहचान करा दी जाती है।


सुसंगत प्रक्रिया को ऐसे भी समझा जा सकता है कि आपको रीसीवर बनाया जाता है, ताकि ब्रम्हांड मे उपस्थित रेकी आपके लिये सुग्राह्य हो।

किसी भी तरह के सुसंगतता मे यही बात होती है, चाहे वो रेकी के लिये हो, अल्फा के लिये या कोई अन्य सभी चरणो मे सुसंगतता की मुख्य भूमिका होती है।
रेकी, अल्फा जैसे प्रणालियाँ सुसंगतता के बिना उतनी ही अधूरी है जिस प्रकार जलधारा के बिना नदी का अस्तित्व।

सुसंगतता कि विधियाँ अलग अलग हो सकती हैं, कई लोग दो दिन मे करते हैं, कई लोग खाली पेट करते हैं, लेकिन अहम बात ये होती है कि सुसंगतता के दौरान उक्त विषय का मास्टर आपके चैनल( चक्र) को औरा के तरंग को सुव्यस्थित करता है।

कई लोग सुसंगतता को लेकर तरह तरह के वहम पाल रखे हैं, सुसंगतता के पहले मुझसे की सवाल पुछे जाते हैं, जैसे कि क्या इस दौरान कोई कष्ट होता है, कोई कठिन प्रणाली है ये? इत्यादि
जवाब हमेशा कि तरह ये है कि-
ये बहूत आसान और कष्टरहित प्रक्रिया है। सुसंगतता के कुछ दिनो बाद ही आपको अपने आपमे फर्क महसूस होने लगता है, और आपको अपने अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति मे अत्यंत सहायक होता है

हाँ सुसंगतता के बाद ये ना समझे कि बस काम हो गया बल्कि आपको जो मेडिटेशन कि विधी दी जाती है, उसका अभ्यास करते रहें।
तभी आपका अभीष्ट सिद्ध होगा।

चलते चलते जोशी भईया के सवाल दिख गयें तो फिर आ गयी...उनका सवाल है-

सुसंगत कैसे करेंगी? और सुसंगत करने के बाद यह मेरे उपर असर कैसे करेगा? क्या यह संभव है

जी जैसा कि बताया है, इसके अलग अलग तरीके होते हैं... मुख्यतः आपको निश्चित समय बता दिया जाता है। जिस वक्त आपको आपने चयनित मेडिटेशन कोर्स को करना होता है, उस निश्चित समय पर आपको कोर्स मास्टर आपके औरा को संगत करके सुसंगत करता है, यह प्रक्रिया आमने सामने होती है.. ग्रैंड मास्टर दुरस्थ सुसंगत करने मे भी सक्षम होता है।

जहाँ तक मेरी बात है, मै दुरस्थ सुसंगत ज्यादा करती हूँ :)

सुसंगत के दौरान ही आपको इसका असर अनुभव होने लगता है, बाकी आपके मेडिटेशन अभ्यास से होता है।

क्या ये सम्भव है??? अब क्या कहूँ... खूद अजमाईये और अपना अनुभव भी बताईये.. चूँकि आप खूद ध्यान क्रिया करते हैं इसलिये इसका जवाब तो आपको पहले से ही पता होगा। :)

विशेष- अभी भी किसी दोस्त को सुसंगतता पर कोई सवाल हो तो जरूर पुछे जवाब देने कि कोशिश हमेशा रहेगी, और लिखने मे कोई भूल चूक हूई हो तो माफी चाहती हूँ।

2 टिप्‍पणियां:

Sagar Chand Nahar ने कहा…

गरिमा जी अवाल जोशी भईया ने नहीं नाहर भैया ने पूछे थे :) खैर जवाब तो मिल गये हैं फिर भी कुछ संशय है मन मैं जिनका समाधान आपसे आगे लेते रहेंगे।
धन्यवाद अच्छे तरीके से समझाने के लिये।

Sanjeeva Tiwari ने कहा…

गरिमा !
चिठ्ठा जगत में आपका स्वागत है,
(हालांकि मैं भी नया हुं )
सुसंगतता के लिये कल सुबह प्रयास करुंगा
तभी कमेंट कर पाउंगा
जानकारी स्पस्ट करने के लिये साधुवाद