बुधवार, 25 अप्रैल 2007

उदय-अस्त

हर रोज उदय होता है सुरज
और रोज ही अस्त होता है
सिर्फ क्षितिज पर नही
"ये" अपने दिल मे भी होता है

फर्क इतना है कि...
आसमान कि एक ही कहानी होती है
"जो" दिल मे है
उसकी रोज नयी निशानी होती है

रोज एक नये सपने को जीने के लिये
रोज एक नये सपने पर मरने के लिये
जिन्दगी के भाग-दौड मे बढने के लिये
अविचलित इस जगत मे उथल-पथल होता है

हां वहा क्षितिज पर
यहा दिल मे होता है...

4 टिप्‍पणियां:

Sagar Chand Nahar ने कहा…

बहुत खूब

यह क्षितिज के अलावा जहाँ कहीं भी होता है, उसमें मेरा दिल भी शामिल है।

Udan Tashtari ने कहा…

वाह, बढ़िया है.

रंजु ने कहा…

रोज एक नये सपने को जीने के लिये
रोज एक नये सपने पर मरने के लिये
जिन्दगी के भाग-दौड मे बढने के लिये
अविचलित इस जगत मे उथल-पथल होता है

हां वहा क्षितिज पर
यहा दिल मे होता है...

बहुत ही सुंदर एहसास है ...

ग़रिमा ने कहा…

सागर भईया, समीर लाल जी और रंजना जी आप सबको अच्छा वाला धन्यवाद :)